कृषि संकट और पूँजीवाद

भारतीय कृषि का संकट अपने चरम पर है और इसके खत्म होने का कोई आसार नजर नहीं आ रहा। यह संकट कोई एक दो साल का नहीं है बल्कि इसके तार 1990 के बाद से सरकार द्वारा अपनाई नीतियों से जुड़ी हुई है। सरकारी संस्थानों और उन पर आश्रित राजनीतिक आर्थिक पंडितों ने इस संकट पर कई बातें कही लेकिन मूल प्रश्न पर सभी खामोश रहे। किसान संगठनों का हाल भी यही रहा है, संकट को केवल उत्पाद का सही कीमत ना मिलने औ koर खेती के लागत का दिनों दिन महँगा होने इसी के आस पास अपनी बातों को रखा है। लेकिन क्या कृषि संकट सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price MSP) और खेती में लगने वाले समान जैसे बीज, कीटनाशक इत्यादि के बढ़ती कीमतों की वजह से है? अगर सिर्फ यही दो संकट का कारण रहते तो फिर इसका समाधान भी आसानी से हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं है। Continue reading

संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष मार्क्सवादी लेनिनवादी का प्रमुख कार्य है

लेनिन अपने लेख ‘मार्क्सवाद और संशोधनवाद’ में लिखते हैं कि अगर जॉमेट्री के नियम का असर मानव हितों पर होता तो उनके खंडन का प्रयास भी निश्चित तौर पर होता। लेनिन की यह बात संशोधनवाद से संघर्ष में एक सूक्ति से कम नहीं है।

लेनिन तब बर्सटीनपंथियों और काउत्स्की के संशोधनवाद से टक्कर ले रहे थे, और आज हम इनके चेलों के अलावा भांति भांति के संशोधनवादियों की पैदा हुई तरह तरह के जमात देखने को मजबूर हैं। चाहे वो यूरो-कम्युनिस्ट धारा के घोषित अघोषित समर्थक हों, ख्रुसचेवपंथी हों या अन्य तरह के ‘मार्क्सवादी’ सभी बराबर पूंजीवाद की चाकरी में लगे हुए हैं। Continue reading

Editorial of Acero Revolucionario (Revolutionary Steel) Organ of Marxist–Leninist Communist Party of Venezuela On the present crisis in Venezuela

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In addition to the capitalist crisis, imperialist aggression, errors of social democracy and weaknesses of the revolutionary movement, a more complex process with deeper consequences is underway in Venezuela: the decomposition of the Bourgeois State. Continue reading