State and Sedition Law: A Comment on Supreme Court’s Decision Suspending G.N. Sai Baba’s bail

जी एन साईबाबा केस में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर टिप्पणी

“जो भी अमेरिकी, अमेरिकी सरकार के वर्तमान प्रशासन का मित्र हैं निस्संदेह वे एक सच्चे गणतंत्रवादी, सच्चे देशभक्त हैं। . . . जो भी अमेरिकी प्रशासन का विरोध करता है वह अराजकतावादी, जोकोबिन और देशद्रोही है। . . . हमारी सरकार के पक्ष में लिखना देशभक्ति है- इसके खिलाफ लिखना देशद्रोह है।”
(कोलंबियन सेंटिनल 1798)

जी. एन. साईबाबा और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य, केस में जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय की एक विशेष बेंच ने छुट्टी वाले दिन, उच्च न्यायालय के फैसले को निलंबित कर दिया, वह विश्व में नहीं तो कम से कम भारत के न्यायिक इतिहास में बिलकुल नया था। जैसा कि कई न्यायविद और टिप्पणीकारों के द्वारा उल्लेख किया गया है कि अब तक मान्य परंपरा रही है कि अदालत के नियमित कामकाज के समय से परे असाधारण बैठकें तब होती हैं जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे शामिल होते हैं या गंभीर संवैधानिक संकट को टालने के लिए होते हैं। यह शायद पहली बार हुआ कि 5 नागरिकों को पुनः जेल में डालने के लिए न्यायालय बैठी। इस जल्दी की क्या अहमियत थी, या यदि वे लोग जेल से बाहर आ जाते तो क्या संवैधानिक संकट खड़ा हो जाता? यह हम माननीय न्यायाधीशों के न्यायिक समझ पर छोड़ देते हैं। वैसे भी भक्ति और अमृतकाल में डूबे देश में कुछ गलत हो इसकी संभावना कम ही है।

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“No Lessons from the Assembly elections”: A Note on CPI(ML)Liberation’s Lessons of the Assembly elections

CPI (ML) Liberation, on 14th March, came up with a note titled “Lessons of the Assembly elections”. The note, which is supposed to be a post-poll analysis of the recently concluded assembly elections should have been ideally titled “No Lessons from the Assembly elections”. Continue reading ““No Lessons from the Assembly elections”: A Note on CPI(ML)Liberation’s Lessons of the Assembly elections”

कामरेड सतनाम का जाना और भारतीय वामपंथ की त्रासदी

कामरेड सतनाम हमारे  बीच नहीं रहे, जिन्दगी के आखिरी वर्षों में अवसाद (डिप्रेशन) और अकेलापन झेलते हुए अंततः उन्होंने ने भी वही राह चुनली, जिसे कुछ ही वर्ष पहले कामरेड कानू सान्याल ने चुना था। किसी का इस तरह जाना और खास कर के ऐसे कामरेड का जिसने अपनी पूरी जिन्दगी ही उस नये सवेरे, उस शोषण मुक्त समाज को हकीकत में उतरने के लिये समर्पित कर दिया हो, वही इतना निराश हो जाये की उसे जिन्दगी ही अर्थहीन लगने लगे यह, एक दिल कचोटने वाली स्थिति को उत्पन्न करता है। कानू से सतनाम तक, और इन दोनों के बीच ना जाने कितने और हमारे पुराने और नये साथी अपनी जिन्दगी को ही खत्म करने जैसा निर्णय लेने पर मजबूर हो रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में तो कई कामरेड के बारे में सुनने को मिलाता रहा ही कि उनकी मृत्यु आत्महत्या की तरफ़ ही इशारा करती है। Continue reading “कामरेड सतनाम का जाना और भारतीय वामपंथ की त्रासदी”