भारत चीन विवाद- फायदा किसका?

जब विश्व कोविड 19 से जूझ रहा है, तब मई महीने में लद्दाख के दो इलाके पैंगोंग-त्सो का गलवान घाटी और फिंगर 4 में भारत और चीन की सेनाओं के हज़ार से भी ज्यादा सैनिक आमने सामने आ चुके हैं। 2017 में हुए डोकलाम के बाद यह इन दोनों देशों की सेनाओं के आमने सामने आने की दूसरी घटना है।

भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई झड़पों में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई है, असल में दोनों देशों के कितने लोग हताहत हुए हैं इसकी जानकारी शायद ही हमें कभी मिल पायेगी, लेकिन यह बात बिना संदेह के कही जा सकती है कि सीमा पर भीषण मुठभेड़ हुआ और दोनों देश की सेनाओं के बीच संघर्ष भी।

यह 1975 के बाद पहला घातक संघर्ष है और 1967 के बाद सबसे गंभीर।

5 मई को दोनों सेनाओं के बीच पैंगोंग झील के किनारी झड़प भी हुई। 9 मई को सिक्किम तिब्बत इलाके में नाकु ला सेक्टर में 5 भारतीय और 7 चीनी सैनिकों के घायल होने की खबर भी आई। इस झड़प में दोनों देशों के करीब 150 सैनिक शामिल थे।

भारत चीन सीमा विवाद और सीमा पर झड़प कोई नई बात नहीं है। दोनों देश के बीच 3,488 किमी की विशाल सीमा है जिसका बड़ा हिस्सा विवादित है। ऐसे में दोनों देशों के बीच सीमा पर झड़पों की खबर आती रही है।

खबर के अनुसार, भारतीय और चीनी सेनाएं अपने ठिकानों पर हथियार, टैंक और जंग के मैदान में इस्तेमाल होने वाली अन्य भारी वाहन ला रही हैं।

इस ताज़ा गतिरोध की वजह भारत द्वारा उस क्षेत्र में सड़क मार्ग बनाने के कारण है। भारत के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार चीन भारत द्वारा लोगों के लिए बनाए जा रहे सड़क को रोकने की कोशिश कर रहा है।

भारत के अनुसार यह निर्माण गतिविधी उसके इलाके में हो रहा है और यह लोगों की मदद के लिए कर रहे हैं। इसका सैन्य नीति के तौर पर कोई लेना देना नहीं है।
डोकलाम क्षेत्र में दोनों देशों के बीच 70 दिनों तक गतिरोध की स्थिति बनी रही थी। और कई छोटे मुठभेड़ की घटना भी सामने आई थी। फिर दोनों देशों के उच्चस्तरीय बैठक के बाद सेनाओं को अपने पूर्व स्थान पर बुला लिया गया था और दोनों देशों ने इसे अपनी जीत घोषित की थी।

भारत में मोदी के आने के बाद से विदेश नीति में भारी परिवर्तन हुए। पहले की सरकारों द्वारा नीरस नीति की जगह मोदी ने इसे एक जश्न में तब्दील कर दिया। अब विदेश मंत्री विदेश नीति न तय कर खुद मोदी ही नीति निर्धारक बन गए है। उनके विदेश मंत्री का नाम शायद ही किसी को याद हो। शुरुआत हुई पहले विश्व भ्रमण से, फिर जिस देश में प्रवासी भारतीयों की तादाद ज्यादा हो वहाँ मोदी का गुणगान उसी तरह से प्रायोजित किया गया। दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों को जोर से गले लगाना और कभी उनके साथ समुद्र किनारे हाथ पकड़ कर घूमना या फिर झूला-झूलना यह सब विदेश नीति का हिस्सा हो गया।

इसे भारत की विश्व में बढ़ती जा रही साख के बतौर जनता को पेश किया गया। मोदी भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के नेता बन गए थे। इस छवि को बनाने के लिए ज़रूरी पड़ा तो विदेशों में प्रायोजित कार्यक्रम या फोटोशॉप की मदद लेने से भी गुरेज़ नहीं किया गया।
नतीजा देश का बड़ा हिस्सा जिसमे मज़दूर वर्ग और मध्यम वर्ग शामिल है, उसे यह यकीन हो चला कि मोदी नीत भारत विश्व गुरु हो चुका है, और 21वीं शताब्दी मोदीमय भारत का ही है।

जब मीडिया जनता को भक्ति संगीत सुना रही होती है, तब यह बात को पूरी तरह से गौण कर देना लाजमी हो जाता है, कि असल में प्रधानसेवक के इन विदेश भ्रमण से फायदा किसे है।

मोदी ने पूँजीवादी व्यवस्था में कई मुद्दे जैसे सैन्य नीति, विदेश नीति, विदेश व्यापार इत्यादि जो पर्दे के पीछे से संचालित होते थे, या जिन पर देशभक्ति की चादर डाली जाती थी, उसे उजागर कर दिया। साथ ही उन्होंने कई मुद्दों को जनता के बीच से गौण कर दिया। मीडिया जिन मुद्दों को जनता के बीच ले जा सकती थी, उसे पहले ही हिन्दू-मुसलमान, अर्बन नक्सली, हिंसक देशभक्ति का झुनझुना दे, सरकारी भक्ति में लगा दिया गया।

भारतीय मीडिया शायद कुछ गिनी चुनी मीडिया है जो सवाल सरकार से ना कर विपक्ष से करती है। देश चलाने का कार्यभार जनता ने भाजपा को सौंपा था, तो सवाल विपक्ष से करने के पीछे क्या इरादा है? अगर जनता को भरोसा विपक्ष पर ही होता तो वह उसे ही चुन कर सरकार बनाने को कहती। खैर, इस बात को यहीं खत्म करते हैं।

मोदी जी जिस देश में गए वह उन्होंने व्यापारिक करार को प्राथमिकता दी। इस्राएल से सैन्य सम्बद्ध तो मजबूत किया गया, और अम्बानी की डिफेंस कंपनी का कई इस्राइली कंपनियों के साथ करार और पार्टनरशिप तय हुआ। राफेल में अनिल अंबानी की कम्पनी को देसी सहभागी बनाया गया, उसी तरह से ऑस्ट्रेलिया में अडानी की कंपनी को कोयले की खान में हो रही समस्या के निदान के लिए भी मोदी जी तत्पर रहे।

और तो और मोज़ाम्बिक से दलहन के आयात पर करार किया गया और यह पूरा व्यापार अडानी को थमा दिया, वह भी जब 2018 में दलहन की रिकॉर्ड पैदावार हुई थी। भारत के किसानों को इसके गिरने वाले दामों से जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा। यह निर्यात से यदि मोजाम्बिक जैसे गरीब देश के किसान को यदि फायदा होता तो एक अलग बात होती। कई अफ्रीकी देशों की तरह मोजाम्बिक में खेती अब कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत होने लगी है, जिसमे बड़ी पूँजी छोटे किसानों से ज़मीन पट्टे पर ले लेती है या उन्हें ज़मीन से ज़बरदस्ती बेदखल कर इन विशाल क्षेत्र के खेतों में अत्याधुनिक तकनीक और मशीनों ले ज़रिये खेती करती है।

यह पूँजीवादी खेती में मज़दूरों का उसी तरह से शोषण किया जाता है जिस तरह से फैक्टरी में मज़दूरों का होता है। इस तरह की खेती से फायदा गरीब किसान का ना हो पूँजी के मालिकों और दलालों के होता है। भारत जब दलहन आयात किया तो हजारों डॉलर की राशि इन्हीं कृषि पूँजीपतियों की जेब में गयी। किसान भारत का हो या मोजाम्बिक का दोनों ही कंगाली और तबाह हो रहे हैं।

यह उदाहरण इसलिए देने की ज़रूरत पड़ी, क्योंकि जनता का बड़ा तबका विदेश और रक्षा नीति को राष्ट्र-भक्ति के साथ जोड़ कर देखता है। जनता की इसी भावुकता की आड़ में पूंजीपति अपना खेल रचते हैं। देशभक्ति और राष्ट्र के नाम पर जनता बड़े से बड़े घोटाला को भी चुपचाप सह लेती है। अपने आँख कान को बंद कर लेती है, उसके इसी भावनात्मक भोलापन का फायदा सैन्य-उद्योग से जुड़ा पूँजीपतियों का गिरोह उठाता है। युद्ध या युद्ध जैसी स्थिति उनकी मुनाफों को कई एक गुण बढ़ा देती है।

Source Indian Express

यह उद्योग पूंजीवादी अंतर राष्ट्रीयता के सिद्धांत पर चलता है, हथियार बनाने वाले तथाकथित सामरिक महत्व के राष्ट्रीय उद्योग अंतरराष्ट्रीय उद्यम है।

दुनिया भर के अलग अलग देशों के पूँजीपति, एक साथ आ अपने मुनाफे को बढ़ाते हैं, और भोली भाली जनता को अंधराष्ट्रवाद में फंसा कर उसे बेवकूफ़ बनाने के कार्यक्रम को अंजाम देते हैं।

एक उदाहरण देखिए, अमरीका भारत को भी हथियार बेचता है और पाकिस्तान को भी, दोनों देश जब इन हथियारों से लैस होकर लड़ते हैं या लड़ने जैसी हरकत करते हैं तो फायदा किस का है?

चीन के हथियारों में लगे समान अमरीकी और यूरोपीय पूँजीपतियों की कंपनियों के हैं, चीन यह हथियार को अन्य देशों को बेचना चाहता है।

यह है विलक्षण पूंजीवादी ढंग।

इस चल रहे सीमा विवाद के कारण दोनों देश की सरकार को और भी फायदा होने वाला है।

कोरोना के कारण चीन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत भारी विरोध हो रहा है। दक्षिणपंथी सरकारें और मीडिया उसे अंतरराष्ट्रीय अपराधी घोषित कर हर्जाना वसूलने की मांग कर रहा है। कई देश उसके खिलाफ प्रस्ताव लाने की बात कर रहे थे। भारत इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़ा हो रहा था। चीन की यह कार्यवाही एक छुपी धमकी भी हो सकती है।

दूसरे चीन की अर्थव्यवस्था घनघोर ठहराव की स्थिति में जा चुकी है, और चीनी सरकार के लिये यह लाजमी हो जाता है कि वह देश में ही निवेश कर अर्थव्यवस्था को शुरू करे। ऐसे छोटे और सीमित झड़पों की आड़ में चीन सैन्य कार्यक्रम और अन्य सैन्य-उद्योग गठजोड़ के सदस्यों के लिए व्यापार और मुनाफे की ज़मीन तैयार कर सकेगा।

कहने को तो चीन में एक नामधारी ‘कम्युनिस्ट पार्टी’ का शासन है, लेकिन 1980 के बाद से ही इस देश मे ‘सुधार’ के नाम पर पूँजीवाद व्यवस्था को पुनःस्थापित कर दिया गया। आज चीन में समाजवादी व्यवस्था नाम मात्र की ही रह गयी है और वह भी केवल भ्रम की स्थिति बरकरार रखने के लिये, मज़दूर अधिकारों, मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थन में बोलने वालों को सरकारी प्रताड़ना और सज़ा झेलनी पड़ती है।

छद्म समाजवाद के नाम पर चीन में एक पार्टी की तानाशाही और पूँजीवादी प्रणाली क़ायम हो चुकी है।

भारत से मुठभेड़ उसे पाकिस्तान में अपने सी.पी.ई.सी कॉरिडोर के खिलाफ उठ रही विरोध की आवाज़ को भी दबाने का मौका देगा।

भारत का घनघोर शत्रु और पाकिस्तान का दोस्त, यह छवि उसके खिलाफ चल रहे आंदोलनों और आवाज़ को खत्म कर देगी। इस कॉरिडोर से मिलने वाला अकूत मुनाफा चीनी कंपनियों और उसके शेयर मालिकों की जेब गर्म करने के काम आएगा।

अंधराष्ट्रवाद का उन्माद जगा कर हांगकांग में फिर से शुरू हो रहे विद्रोह को भी बेजिंग में बैठी सरकार कुचलना छाती है। इस विद्रोह के पक्ष में अमरीका और लगभग सारी पश्चिमी देशों की सरकार और मीडिया खड़ी हो रही थी, जिस के कारण नामधारी ‘कम्युनिस्ट’ सरकार इसके खिलाफ बलप्रयोग से बचती आ रही थी।

दूसरी तरफ भारत की सरकार के लिये भी यह मुठभेड़ अच्छे समय पर शुरू हुआ।

कोविड-19 के पहले लंगड़ाती हुई देश की अर्थव्यवस्था महामारी के शुरू होने पर तबाही की कगार पर खड़ी हो गयी है। मोदी शासन में हुए आर्थिक कुप्रबंध के कारण पहले ही भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से कर्ज ले कर सरकार चला रहा है, सेना की युद्ध तैयारी के बारे में भी लगातार खबरें आती रही है। ऐसे समय वह एक छोटा सीमित युद्ध भी नहीं करना चाहेगा।आर्थिक मंदी का मार झेल रहे पूँजीपति भी यह नहीं चाहेंगे।

फिर यह मुठभेड़ से क्या हासिल होने वाला है? जवाब है बहुत कुछ।

मोदी सरकार द्वारा कोविड-19 के प्रबंध में हुई घोर लापरवाही, आर्थिक दिवालियापन पर देश को खड़ा करना, बेरज़ोगरों की रोज़ बढ़ती सेना, नागरिक अधिकारों का हनन, नागरिकता कानून लाना, और इन से उपज रहे विरोध की आवाज़ को दबाने का राष्ट्रवाद से बढ़ कर कोई तिलस्म नहीं। इसीलिए तो जैसे ही चीन की सैनिक गतिविधियों की खबर आई सबसे पहले माननीय प्रधानमंत्री आने सेना प्रमुखों से मिले फिर उसके कुछ दिन बाद उनका महकमा शांति और स्थिति नियंत्रण कार्यक्रम में लगा।

तब तक भारतीय मीडिया ने उनके शौर्य, पराक्रम और लाल आँखों का तिलस्म जनता के बीच प्रसारित कर दिया। जनता राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय सम्मान के खातिर अपनी कठिनाइयों को भूल गयी, उसकी कठिनाइयों के बारे में उठ रही आवाज़ देशप्रेम में डूब गई।

सरकारें जब एक दूसरे के खिलाफ जब तलवार भांजती है, तब तब वह अपने देश में सरकार विरोधी आंदोलनों को बेरहमी से कुचलती है

आधुनिक सैन्यवाद पूँजीवाद का फल है। जो मज़दूरों के हर किस्म के आर्थिक तथा राजनीतिक आंदोलनों को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

चीन, हाल ही में भारत सरकार द्वारा विदेशी निवेश के नियम में बदलाव से भी नाखुश है।

इस नियम के तहत अब भारत के पड़ोसी देशों से आने वाले निवेशों को अब भारत सरकार की मंजूरी लेनी होगी। चीन इस आदेश को अपने व्यापारिक उद्देश्यों के खिलाफ मानता है।

पिछले कुछ वर्षों में चीनी निवेश भारत में तेज़ी से हुआ है। साल 2015 से 2019 के बीच ही चीन ने 1.8 अरब डॉलर का निवेश भारत में किया था। याद रखिये यह वही समय भी था जब कि व्हाट्सएप्प पर भक्त हमें चीनी समान के बहिष्कार करने को कह रहे थे। एक तरफ जनता को चीनी समान के बहिष्कार की बात की जा रही थी वहीं दूसरी ओर चीन को निवेश करने की इजाज़त थी।

भारत की कम्पनी जैसे पेटीएम, बायजू, ओला जैसी कितनी ही कंपनियों में चीनी निवेश हैं।

चीन भारत से यह कदम वापिस करने की माँग कर रहा है। मतलब युद्ध के पीछे छिपा है वही पूंजी का दानव और उसकी मुनाफ़े की अमिट इच्छा।

चीन की स्थिति भी भारत जैसी ही है, कोविड के कारण उसकी अर्थव्यवस्था भी संकट से गुज़र रही है। उसके ऊपर हॉंग-कॉंग में फिर से सरकार विरोधी प्रदर्शन बढ़ रहे हैं। चीन का झूठा समाजवाद भी समूचे विश्व के सामने नंगा हो चुका है।

उसकी कलई खुल गयी है। शी जिनपिंग की सरकार हर तरफ से घिरी नज़र आ रही है। चीन के अंदर आज माओ के बारे में और उनके विचारधारा के ऊपर चर्चा करने वालों को जेल में डाला जा रहा है, और उसके औद्योगिक शहरों में मज़दूरों में भारी आक्रोश है।

मज़दूरों की काम करने की स्थिति को लेकर कई मालिकों और प्रशासन से बार झड़प होने की खबर आती रही है कुल मिलाकर वह भी संकटों से घिरा हुआ है।

ऐसे में शी जिनपिंग के पास भी देशभक्ति नामक तुरप के पत्ते को इस्तेमाल करने के अलावा और कोई चारा नहीं रह गया था।

इसलिए यह झड़प दोनों सरकारों की मजबूरी बन गयी है।

ऐसे में अंतराष्ट्रीय सर्वहारा आंदोलन और खास कर के दोनों देशों के जनपक्षधर तबकों का यह दायित्व बनता है कि वह मेहनतकश जनता के बीच इस तरह के छद्मराष्ट्रवाद की असलियत को उजागर करे, अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ मुहिम छेड़ सरकार का असली चेहरा सामने लायें।

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