मन की बात से पेट नहीं भरता

मोदी ने आज  फिर मन की बात  की, और अपने चिर परिचित नाटकीय ढंग से देशवासियों से 21 दिन के लौकडाउन के लिए माफी मांगी।

पहले 2 दिन के लिए देश को बंद कर दिया फिर बिना किसी तैयारी के इस राष्ट्रीय कर्फ्यू को 21 दिन का कर दिया और आज इन सब बद इन्तेज़ामी के लिए माफी मांग कर अपना पल्ला झाड़ लिया।

लेकिन क्या सिर्फ माफी मांगने से भूख खत्म हो जाती है?

मज़दूर और गरीब अपने पूरे परिवार के साथ सड़कों पर है, 1947 के दृश्य आज भारत की सड़कों पर फिर से घटित हो रहा है, इन सब से दूर सरकार देशवासियों के लिए रामायण और महाभारत का प्रसारण करने जा रही है।

जब कारोना फैलाव के अपने आरंभिक चरणों मे था, तब मोदी ट्रम्प को भारत भ्रमण करवाने में मशगूल थे।

अपने पूंजीपति मित्रों को बेल आउट पैकेज दे रहे थे, और उन पर देश की जनता के पैसे न्योछावर कर रहे थे।

बेल आउट के नाम पर 8 लाख करोड़ रुपये माफ कर चुकी है, वहीं जनता के कल्याण में किये जाने वाले खर्चे को हर साल कम करती जा रही है।

स्वास्थ्य के नाम पर भारत सरकार हर व्यक्ति पर केवल 1657 रुपये हर साल खर्च करती है, जो की विश्व मे सबसे कम खर्चो मे से एक है।

करोना जब दस्तक दे रहा था, तब इजराइल से 8.7 अरब रुपये के हथियार की खरीद में साहब मशगूल थे।

इनके के पास करोड़ों रुपये के सैनिक हथियार खरीदने के लिए पैसे हैं, लेकिन करोना से लड़ने के लिए उसे जनता से चंदा मांगने में शर्म नहीं आ रही।

बातें विश्व विजेता बनने की करने वाले मोदी सरकार, जनता पर हर तरीके से अत्याचार करने में महारत हासिल कर चुकी है।

पहले नोटबन्दी तो आज घरबन्दी, सनक में सरकार फैसला लेती है और नतीजा आम जनता और खास कर के गरीब को झेलना पड़ता है।

जनवरी से ही कोरोना के बारे में खबर आ रही थी, सरकार लेकिन सोई रही। शुतुरमुर्ग की भांति आंखे बंद कर लिया कि खतरा टल जाएगा। ट्रोल आर्मी को आवाज़ दबाने पर लगा दिया।

ट्रोल आर्मी को आवाज़ दबाने पर लगा दिया।

फिर एकाएक 2 दिन और फिर 21 दिन के लिए पूरे देश को बंद कर दिया, बिना किसी तैयारी के।

बिना सोचे कि जनता पर इस का क्या असर होगा?

पहले से ही बेरोज़गारी और गरीबी झेल रहे लोग कैसे खाएंगे, कैसे रहेंगे।

आप पूछेंगे कि फिर सरकार क्या करती?

जवाब है– तैयारी

दक्षिण अफ्रीका में जब लॉक डाउन का फैसला लिया गया तो 3 दिन पहले ही जनता को बात दिया गया था।

छोटा सा देश है क्यूबा, उसने जनवरी से ही इस आपदा से लड़ने की तैयारी शुरू कर दो थी। सभी हस्पतालों में कोरोना के इलाज के लिए तैयारियां शुरू कर दी गई थी। पर्यटन को बंद कर दिया गया था वह भी तब जब इस उद्योग से ही क्यूबा को ज़रूरी विदेशी मुद्रा मिलती है।

लोगों को मास्क बनाने के लिए टीवी पर बताया जा रहा था, और हमारे यहां रामायण दिखया जा रहा है।

इसे कहते हैं आपदा प्रबंधन, हमारे यहां की तरह सरकार जनता को सरप्राइज नहीं देती, और न ही अनाथ छोड़ती है।

बिना सोचे कि इस देश का 94 प्रतिशत मज़दूर वर्ग असंगठित क्षेत्र में काम करता है, जिस बात की पुष्टि इनका आर्थिक सर्वेक्षण खुद करता है। यह विशाल आबादी, रोज़ कमाने और खाने वाली स्थिति में जीवन यापन करती है, और इनके पास किसी भी प्रकार का बचत नहीं रहता की आपदा की स्थिति में अपना भरण पोषण कर सकें।

यह बात तो सभी को नोटबन्दी के दौरान भी दिखी थी, तो फिर यह जनता को दूसरा झटका क्यो।

हर कुछ सालों बाद उसे दहशत में डालने से सरकार को क्या आंनद आता है? इस बात का जवाब भी इस सरकार को देना होगा?

जिन लोगों ने गरीबों के बारे में, उनके हालात पर सवाल उठाये उन्हें विकास विरोधी, देशद्रोही और अर्बन नक्सल जैसे संज्ञा से नवाज़ते हुए जेल भेज दिया गया।

लेकिन, आवाज़ को दबाया जा सकता है हकीकत सामने आ ही जाती है।

आज भारत की सड़कों पर चल रहे हज़ारों लाखों बेबस जन इस बात का सबूत है कि सरकार झूठ बोलती है।

निर्मल सीतारमण ने 1.76 लाख करोड़ के पैकेज की बात कह कर खामोश हो गयी।

इसमे गरीबों को मुफ्त राशन और गैस जैसी कई बातें कही गयी। लेकिन सवाल उठता है कि ये सब ज़मीन पर किस तरह कार्यान्वित होगा?

★ जब देश मे लॉकडाउन है, फिर राशन की दुकान तक लोग किस तरह से पहुंचेंगे?
★ यातायात बन्द है तो समान की आवाजाही किस प्रकार से होगी?
★ जो लोग सड़क पर हैं उन्हें अगर राशन मिल भी गया तो वो उनका करेंगे क्या?
★ और इन सामानों की काला बाज़ारी नहीं होगी, यह किस तरह से सरकार सुनिश्चित करेगी?

इन सवालों पर सरकार मौन है।

इसलिए नहीं क्योंकि उस के पास कोई जवाब नहीं है, बल्कि इसलिए क्योंकि उसे कुछ करना ही नहीं है।

इसलिए नहीं क्योंकि उस के पास कोई जवाब नहीं है, बल्कि इसलिए क्योंकि उसे कुछ करना ही नहीं है।
अगर करना होता तो वह कुछ फैसले तुरंत ही ले सकती थी।

जैसे कि हर शहर और गांव में मुफ्त राशन के स्टाल खोले जा सकते थे, जहां 24 घंटे 7 दिन कोई भी सामान खरीद सकता।

मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों को राष्ट्रीयकरण कर उन्हें रहने और खाना खाने के स्थान में तब्दील किया जा सकता था।

इस्कॉन मंदिर के पास ऐसी मशीने हैं जो हज़ारों रोटी और दाल कुछ मिनटों में पाका सकती हैं, इन मशीनों को अपने कब्ज़े में कर लाखों लोगों के लिए खाने इंतेज़ाम किया जा सकता था। ऐसी ही व्यवस्था मस्जिदों और चर्चों में है।

खुले मैदानों में कुछ ही घंटों में रहने के लिए मकान तैयार किया जा सकता है, ऐसी तकनीक सेना और अन्य कई संस्थानों के पास है, पोटा केबिन इसका कई तरीको में एक उदाहरण है।

मकान मालिकों से मोदी और केजरीवाल जो बहुत जल्दी ही भाजपा की बी टीम की मुद्रा अख्तियार कर रहे हैं, दोनों किरायदारों पर दया करने की भीख मांग रहे हैं

लेकिन यह प्रस्ताव नहीं पारित कर सकते कि सभी मकान सरकारी निगरानी में आ गए हैं और अब से हालात सामान्य होने तक वे सरकारी संपत्ति के तौर पर माने जाएंगे।

कोई भी इस के खिलाफ काम करता पाया गया तो उसे फौरन हिरासत में लिया जाएगा।

लेकिन यह प्रस्ताव नहीं पारित कर सकते कि सभी मकान सरकारी निगरानी में आ गए हैं और अब से हालात सामान्य होने तक वे सरकारी संपत्ति के तौर पर माने जाएंगे।

कोई भी इस के खिलाफ काम करता पाया गया तो उसे फौरन हिरासत में लिया जाएगा।

रेल बंद है लेकिन इसे आज रोड पर पैदल चल रहे लोगों को उनके गन्तव्य पर ले जाने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता था, जिसमे स्वास्थ्य कर्मी उनके स्वास्थ्य की जांच भी कर सकते थे।

हस्पताल की कमी की बात सामने आ जाने के बावजूद सरकार कुम्भकर्ण की भांति सोई हुई है।

सभी हस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर उनमे से कुछ को केवल कोरोना के लिए तैयार किया जा सकता था। सरकारी और प्राइवेट सभी डॉक्टर को इन हस्पतालों में लगाया जा सकता था और साथ ही सेना के हस्पताल और डॉक्टर की मदद ली जा सकती थी।

चिकित्सा उपकरणों को बनाने के लिए, अन्य फैक्टरियों को बोला जा सकता था जैसे मास्क कपड़ा बनाने वाली हज़ारों कंपनियों मके आसानी से बने जा सकता है।

वैसे ही अन्य उपकरणों को अलग अलग कंपनियों में बनाया जा सकता है।

लेकिन यह सब इस देश में होने वाला नहीं है क्योंकि यहाँ एक निकम्मी, निर्दयी और झूठी शासन व्यवस्था है जिसे गरीबों से केवल मुनाफा कमाने आता है और फिर उनसे कुछ भी सरोकार नहीं होता।

वास्तव में, यह भारत के लोगों के लिए अपनी बेजानता को दूर करने, अपने आक्रोश को व्यक्त करने, अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ उठने और लड़ने का समय है।

इस लड़ाई में किस तरह से नेतृत्व किया जाएगा, किस तरह से अपनी रक्षा और अपने साथ हो रहे अत्याचार को खत्म किया जाएगा – ये ऐसे सवाल हैं, जिन पर वह गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है।

26-03-2020

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s