कृषि संकट और पूँजीवाद

Posted on July 19, 2019

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भारतीय कृषि का संकट अपने चरम पर है और इसके खत्म होने का कोई आसार नजर नहीं आ रहा। यह संकट कोई एक दो साल का नहीं है बल्कि इसके तार 1990 के बाद से सरकार द्वारा अपनाई नीतियों से जुड़ी हुई है। सरकारी संस्थानों और उन पर आश्रित राजनीतिक आर्थिक पंडितों ने इस संकट पर कई बातें कही लेकिन मूल प्रश्न पर सभी खामोश रहे। किसान संगठनों का हाल भी यही रहा है, संकट को केवल उत्पाद का सही कीमत ना मिलने औ koर खेती के लागत का दिनों दिन महँगा होने इसी के आस पास अपनी बातों को रखा है। लेकिन क्या कृषि संकट सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price MSP) और खेती में लगने वाले समान जैसे बीज, कीटनाशक इत्यादि के बढ़ती कीमतों की वजह से है? अगर सिर्फ यही दो संकट का कारण रहते तो फिर इसका समाधान भी आसानी से हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं है।

सन 1990 के बाद से देश की आर्थिक नीति ने एक निर्णायक मोड़ लिया। नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के निर्देश पर भारत में एक नए आर्थिक नीति लागू की गई, जिसे नव-उदारवादी नीति कहा जाता है। इस नव उदारवाद में न ही कुछ नया था और न ही किसी भी तरह की उदारता, असल में यह नीति पूंजीवाद का ही और भयंकर रूप है, जिसमें सरकार सभी जन कल्याण और जन सुविधा के क्षेत्र को भी पूँजीपतियों के हवाले कर देती है। स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती इन सब को निजी क्षेत्र के सुपुर्द कर पूँजीपतियों के मुनाफ़े को कई गुणा बढ़ाने की नीति ही नव-उदारवादी विचार की खास बात है।

इस नीति के तहत सरकार ने खेती को बाजार आधारित करने के लिए खुद को इस क्षेत्र से अलग करना शरू कर दिया। 1947 के बाद भारत में समाजवादी नमूने का समाजकी बात की गई थी, जिसमे जन कल्याण की अवधारणा को सरकारी नीति के केंद्र में रखना, देश को स्वाबलंबी बनाना और निजी क्षेत्र को सीमित रखना जैसी बातें कही गयी थी। हालांकि यह समाजवाद असली समाजवाद से कोसो दूर था और असल में पूँजीपतियों की ही सेवा करता था, बस समाजवाद का नक़ाब ओढ़ जनता खास कर मज़दूर किसानों को बेवकूफ़ बनाने का उस समय का जुमला भर था, ताकि मजदूर और किसान रूसी और अन्य जगह की क्रांति से प्रेरित हो, यहाँ भी इन खून चूसने वालों का तख्ता न पलट दें। देश में कम्युनिस्ट संगठनों द्वारा चलाए जा रहे मज़दूर किसानों के आंदोलन को भी जबरदस्त सफलता मिल रही थी, यह कारण भी था कि तब की कांग्रेसी सरकार समाजवाद की बात कर पूँजीपतियों के काम कर रही थी। लेकिन इस फर्जीवाड़े के पीछे कुछ जन कल्याण के कदम भी मजबूरन सरकार को उठाने पड़े थे।

1990 के बाद से सरकार ने वित्तीय घाटे को कम करने की बात की, यह घाटा कम दो प्रकार से हो सकता था, या तो सरकार पूँजीपतियों से ज्यादा टैक्स वसूलती या वह अपने खर्चों में कटौती करती। लेकिन पूँजीपतियों से ज्यादा कर वसूलने के मतलब होता अपने अंतरराष्ट्रीय मालिकों को नाराज़ करना, जो लगातार भारत के बाजार पर कब्ज़ा जमाने की आस लगाये हुए थे, तो फिर बचा दूसरा रास्ता, जिसे सरकार ने चुना। पूँजीपतियों को टैक्स में छूट दी, साथ ही में विकास, और सामाजिक दायित्व के काम जैसे शिक्षा, हस्पताल, सब्सिडी इत्यादि पर होने वाले खर्चों को ख़त्म कर दिया या बहुत ही कम कर दिया गया।यह कदम खास कर के कृषि क्षेत्र में जबर्दस्त तौर से किया गया, जहां सरकार ने पूरी तरह से खुद को कृषि और ग्रामीण विकास की योजनाओं से अलग कर या तो उन्हें पूँजीपतियों को मुनाफ़ा कमाने के लिए दे दिया या उन्हें बंद कर दिया। कृषि को बढ़ते पैमाने पर विश्व बाज़ार के साथ जोड़ा गया। राज्य द्वारा किसानों को दिए जाने वाले समर्थन में कटौती की गई और कृषि लागत और कृषि उत्पादों के बाज़ार में बड़ी पूंजीवादी कंपनियों का लगातार विस्तार हुआ।

सरकार द्वारा सबसे पहला कदम था बीजों पर से राज्य का नियंत्रण खत्म कर उन्हें पूँजीपतियों के हवाले कर देना। उदारीकरण से पहले बीज सरकार बंटती थी और इसे बहुत कम दामों में किसानों को मुहैया कराती थी। जो इस क्षेत्र में निजी कंपनियां थी भी उनपर सरकारी नियंत्रण रहता था। इस बीज नियंत्रण को खत्म कर दिया गया और इसे बाजार तथा बड़ी बहु-राष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि किसान इन कंपनियों के बीज को महंगे दामों में खरीदने पर मजबूर हो गया और इन वैज्ञानिक तरीकों से संशोधित बीज को हर साल उसे खरीदने के लिए भी मजबूर हो गया। पहले खुद फसल से ही कुछ हिस्सा बीज के रूप में फिर से इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के बीज को एक बार ही इस्तेमाल किया जा सकता है। इन संशोधित बीज से पैदावार में बढ़त तो हुई लेकिन इनके रखरखाव में कीटनाशक और अन्य रासायनिक खादों की कई गुना अधिक ज़रूरत होती है। इसी तरह से खाद और कीटनाशक क्षेत्र को भी बाजार और निजी कंपनियों के सुपुर्द कर दिया गया, साथ ही खाद पर दिए जा रहे सब्सिडी में भारी कटौती कर दी, जिसका फौरन असर इन दोनों के बढ़े दामों पर पड़ा। उदारीकरण के दौर में सरकार ने ग्रामीण विकास और किसानों पर होने वाले राजस्व को बंद कर दिया और कृषि संबंधी रिसर्च पर होने वाले खर्च को लगभग खत्म कर इन्हें भी निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया गया।

कुछ उदाहरण से हमारी बात और साफ हो जाएगी। स्वतंत्रता से पहले, भारतीय किसानों ने 100,000 धान की किस्मों के रूप में विकसित किया था; आज पूरे भारत में केवल 5,000 धान की किस्मों की ही खेती की जाती है। जिसमे ज्यादातर हाइब्रिड क़िस्म है। हाइब्रिड फसलों को उगाने के लिए बीज की कीमत गैर हाइब्रिड बीज की तुलना में कहीं ज्यादा होती है, साथ में इन फसलों को खाद, कीटनाशकों और पानी जैसे इनपुट की ज्यादा खुराक चाहिए जिससे खेती की लागत में जबर्दस्त बढ़ोतरी हो जाती है। लंबे समय में, इन जहरीले रसायनों के उपयोग से मिट्टी खराब हो जाती है, क्योंकि इन रसायनों से मिट्टी में रहने वाले जीव और सूक्ष्म जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, जो ज़मीन की उर्वरकता को कायम रखने के लिए ज़रूरी हैं। इनके नष्ट होते ही मिट्टी एक प्रकार से ‘मृत’ हो जाती है और उसमें फसल उगाने के लिए पहले से कहीं अधिक मात्रा में खाद और अन्य रसायनिक पदार्थों की ज़रूरत होती है। 2006 और 2013 के बीच कपास के उत्पादन की कुल लागत में 2.7 गुना वृद्धि हुई (जब आनुवंशिक [जेनेटिक] रूप से संशोधित बीटी-कपास का व्यवसायिक तौर पर विस्तार शुरू हुआ) , जबकि पैदावार में कोई खास बदलाव नहीं आया । (Pari वेबसाइट से)

फिर भी हमारी सरकार इन्हीं बीजों को बढ़ावा दे रही है। भारतीय हाइब्रिड बीज व्यापार में पिछले कई वर्षों में सालाना 15-20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और 2018 में इसके लगभग 18,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। इस क्षेत्र में 300 से अधिक कंपनियों ने डेरा डाल रखा है पर सिर्फ 10 घरेलू और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बाजार में 80 प्रतिशत से अधिक का नियंत्रण है। साफ है कि बाजार पर कब्ज़ा बडी कंपनियों का ही है। जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है उसी तरह से पूँजीवाद में बड़ा पूँजीपति छोटे पूंजीपति को खत्म कर देता है। बाद में हम देखेंगे कि किस तरह से इसी मत्स्य न्याय के कारण आज भारत का सीमांत और छोटा किसान भी अपने आप को इस संकट से नहीं बचा सकता जब तक की इस पूरी शोषण आधारित व्यवस्था को नहीं खत्म किया जाए।

यह सारे काम सरकार ने दुनिया में अमरीका परस्त साम्राज्यवादी पूंजीवादी व्यवस्था को चलाने और बड़ी पूँजीपतियों के लिए काम करने वाली संस्था विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन (तब गैट) के आदेश पर किया था। अपने आका अमरीका और उसके द्वारा निर्देशित ये तीनों संस्थाओं को खुश करने के चक्कर में स्वतंत्र भारत की सरकार भूल गयी की इस देश की कृषि व्यवस्था किस प्रकार की है। अमरीका और यूरोप से अलग भारतीय किसान का बहुत बड़ा भाग छोटे और सीमांत किसान है, जिनके पास मुश्किल से अपने खाने लायक ही पैदावार होती है, बाजार में बेचने के लिए ना के बराबर या बहुत थोड़ी ही उपज होती है। जहाँ अमरीका में एक किसान के पास औसतन 443 एकड़ ज़मीन है, वहीं भारत में यह औसत 1.23 एकड़ है। खेत छोटे होते जा रहे हैं, जहाँ 1971-72 में किसान के पास खेत का औसत आकार 2.28 हेक्टेयर था वहीं 2010-11 तक प्रति किसान औसतन भूमि केवल 1.15 हेक्टेयर हो गयी थी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समुदायों के किसानों की स्थिति और भी खराब है। 1980-81 में अनुसूचित जातियों के किसानों पास औसत भूमि 1.15 हेक्टेयर थी, जो 2010-11 में 0.8 हेक्टेयर रह गया। इसी प्रकार अनुसूचित जनजाति के किसानों के लिए इसी दौरान खेत का आकार 2.44 हेक्टेयर से घाट कर 1.52 हेक्टेयर तक हो गया।

दूसरा आंकड़ा भी ध्यान देने लायक है; देश मे 67% किसान 1 हेक्टर से कम ज़मीन पर खेती करते हैं तथा 18% किसान 1 से 2 हेक्टेयर भूमि के मालिक हैं जिसका मतलब यह है कि भारत में किसानों का 85% सीमांत या छोटे किसान हैं, जबकि 0.7% किसान के पास 10.5% कृषि भूमि है। भारत की 45 प्रतिशत ग्रामीण आबादी भूमिहीन है और इनकी संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। 2001 से 2011 के बीच 90 लाख किसान खेती से बाहर हुए और खेत मजदूरों की संख्या में 35 प्रतिशत की बृद्धि दर्ज की गई।

अब सोचिए की ऐसे देश में किसान की हालत क्या होगी?

खेती आज भी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। वित्तीय वर्ष 2018 में खेती, वन और मत्स्य पालन से 18.53 अरब रुपये के सकल मूल्य का योगदान रहा। 1947 में देश की जीडीपी में कृषि का हिस्सा 52 प्रतिशत था, और 70 प्रतिशत आबादी तब सीधे कृषि से जुड़ा था। आज हमारी कितनी आबादी कृषि से जुडी हुई है इस पर कोई एक आंकड़ा हमारे पास नहीं है। जहाँ कुछ रिपोर्ट के अनुसार ‘हमारी आबादी का 58 प्रतिशत हिस्सा सीधे कृषि से सीधे जुड़ा है’ वहीं दूसरी और देश की अर्थव्यवस्था पर निगरानी रखने वाली संस्था सेन्टर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के अनुसार देश की करीब 36 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है। पर जीडीपी में कृषि के कम होते हिस्से पर सभी की एक ही समझ है। आज जीडीपी में कृषि का लगभग 14 प्रतिशत ही बचा है। यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है, कृषि की जीडीपी में हिस्सेदारी में 73 प्रतिशत की गिरावट हुई है, लेकिन वहीं दूसरी तरफ उस पर निर्भर आबादी की संख्या में उस मुकाबले की गिरावट नहीं देखी जा सकी। देश की अर्थव्यवस्था का विकास दर तेज़ी से बढ़ा है और अन्य क्षेत्र का जीडीपी में ज्यादा योगदान रहा हैं, कृषि योगदान कम तो हुआ है, लेकिन आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा उसी पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र में ज़रूरत से ज्यादा लोग लगे हुए हैं जो बहुत कम पैसे पर काम करने को मजबूर हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके पास रोज़गार का कोई अन्य साधन उपलब्ध नहीं है। विकास दर की बढ़ोतरी के समानांतर इन नए क्षेत्रों में रोज़गार पैदा नहीं हुए, और ये वृद्धि से उपजी कमाई आम जनता के साथ साझा ना हो कर पूँजीपतियों की ज़ेब में चली गयी। इसी विकास का एक पहलू और है, पूंजीपति बड़े कल कारखानों को लगाने की जगह सेवा क्षेत्र में ही ज्यादा निवेश किया है, जिससे जीडीपी में तेज़ी तो आई क्योंकि देश में पूंजी लगाया गया पर उस पूंजी से नए रोज़गार पैदा नहीं हुए। विकास के इस गड़बड़झाले से सरकारी अर्थशास्त्री अनभिज्ञ नहीं हैं, तभी तो इस तरह के विकास को उन्होंने एक नाम दे दिया, “जाबलेस ग्रोथ” यानी बिना रोज़गार सृजन के विकास। यही विकास का मॉडल हिंदुस्तान में लागू किया गया, जिसका परिणाम हम सब के सामने है।

कृषि की विकास दर

कृषि विकास दर आखिर कितनी है इस पर भी कोई सहमति नहीं है, साल 2017-18 में तो हमें अजीब स्थिति देखने को मिली जब सरकार ने अपनी ही एजेंसी के आंकड़े को झुठला दिया। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने वर्ष 2017-18 में कृषि, फॉरेस्ट्री और मछली-पालन क्षेत्र में विकास की दर को 4.9 फीसदी से गिरकर 2.1 फीसदी तक आने की आशंका जताई थी, जो स्पष्ट तौर से एक भयंकर संकट की ओर इशारा करती थी। लेकिन कृषि मंत्रालय ने इन आंकड़ों को ही गलत साबित कर दिया। आंकड़ों के हेर फेर से संकट टालने वाला नहीं है, यह बस लोगों को मूर्ख बनाने का काम कर सकता है। 2018-19 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार कृषि, वन और मत्स्यपालन जैसी गतिविधियों की वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष में 3.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो इससे पिछले वित्त वर्ष में 3.4 प्रतिशत रही थी। कृषि मामलों के विशेषज्ञ देवेन्द्र शर्मा के लिखा कि, “CSO के आंकड़े के मुताबिक अक्टूबर-दिसंबर, 2018 की तिमाही में पिछले 14 साल में कृषि आय सबसे कम आंकी गई. वहीं कृषि और गैर कृषि मजदूरी भी सबसे निचले स्तर पर रही. इसका साफ मतलब है कि ग्रामीण इलाके में हालात खराब हैं.” लेकिन बिज़नेस स्टैण्डर्ड में छपे रिपोर्ट के अनुसार, 2018-19 के पूरे वर्ष, कृषि और संबद्ध गतिविधियों में करीब 2.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो 2017-18 में 5 प्रतिशत से नीचे थी। आंकड़ा कुछ भी हो, यह बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कृषि संकट को कम हो रहा है, या उसके खत्म होने की तरफ कदम उठाए जा रहे हैं।कृषि संकट ना ही कम हो रहा है, और नहीं ही उसे खत्म करने के लिए कोई कदम ही उठाये जा रहे हैं। इसके उलट सरकार द्वारा भ्रम पैदा करना यह दर्शाता है कि यह संकट से उबरने के रास्ता सरकार के पास है ही नहीं।

एक तरफ तो कृषि विकास की दर बहुत ज्यादा धीमी है, वहीं दूसरी ओर अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में आयी गिरावट और रुकाव से बढ़ती बेरोज़गारी के कारण खेती में ज़रूरत से ज्यादा लोग काम करने को मजबूर हो रहे हैं।

सेन्टर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की, जिसमें दिए गए आंकड़े कृषि क्षेत्र में लगे लोगों की संख्या पर कुछ चौकाने वाली जानकारी देती है। उसके मुताबिक, पिछले एक साल में खेती से जुड़े लोगों की संख्या में 50.1 लाख लोगों को की संख्या में वृद्धि हुई है, 142.8 लाख से यह बढ़ कर इनकी संख्या 147.9 लाख पहुँच गया। यह आंकड़ा 3.6 प्रतिशत वृद्धि को दर्शाता है।

कृषि विकास की दर 3 प्रतिशत के आस पास सरकारी आंकड़ों के अनुसार है,  वहीं खेती में एकाएक लाखों लोग जुड़ रहे है, इसका मतलब क्या है? शहर में कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था के कारण उद्योग धंधे में रोज़गार खत्म हो रहे हैं, जिसके कारण लोगों के पास फिर से खेती की तरफ जाने को मजबूर हो रहे हैं। कृषि में इन अतिरिक्त हाथों की ज़रूरत नहीं है, ये नए लोग उससे जुड़े हैं शहरी रोज़गार ना होने की स्थिति में। इसका असर सीधा कृषि आधारित परिवारों की आमदनी पर पड़ेगा और साथ में मांग से कहीं ज्यादा आपूर्ति के कारण कृषि क्षेत्र में मजदूरी में गिरावट होगी। सीएमआईई ने लिखा की असल मे कृषि क्षेत्र को इस अतरिक्त श्रम की ज़रूरत नहीं थी उसने तो बस इसे किसी तरह ले लिया।

घाटा, कर्ज, बढ़ता लागत मतलब आत्म हत्या

आसान किस्तों पर कर्ज किसानों की खुशहाली का रास्ता है, यह बात सरकार और उसके बलबूते पर अपनी पाण्डित्य बघारते अर्थशास्त्री और नीति निर्धारकों के मुंह से कई बार सुनी गई है। वहीं दूसरी ओर हमे किसानों की आत्महत्या के पीछे बढ़े कर्ज़ और उसके ब्याज में इस कदर फंसा आदमी दिखाई देता है जिसके पास आत्महत्या जैसे कठोर निर्णय लेने के सिवाय और कोई चारा नहीं दिखाई देता। आखिर सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? कृषि और ग्रामीण मामलों पर बेबाकी से लिखने वाले पत्रकार पी.साईनाथ का बयान द हिन्दूअखबार में छापा था, साईनाथ कहते हैं कि कृषि कर्ज़ को किसानों के बजाय खेती आधारित उद्यम (एग्री बिज़नेस) हजम कर रहे हैं, महाराष्ट्र में सन 2000 से 2007 तक 50,000 से कम राशि के कर्ज की संख्या में करीब 50% तक कमी आई और 10 करोड़ से 25 करोड़ तक कि कर्ज़ की संख्या दुगनी और तिग्गुणी हो गयी। मतलब साफ है किसान और कृषि के नाम पर पूँजीपतियों की चांदी है, जो किसान के नाम पर कम ब्याज के कर्ज को हजम कर अपना मुनाफा बढ़ रहे हैं। पूँजीवादी खेल का यह हिस्सा बड़े दिनों से चल रहा है, और इस फर्जीवाड़े पर किसी भी किसान संगठन या किसान मसले पर काम कर रहे लोगों का ध्यान नहीं गया, जो किसान मुद्दे आधारित राजनीति के एक और दिवालियापन को दर्शाता है। इस आंकड़े से एक बात और साफ होती है कि किसान और कृषि प्रश्न पूंजीवादी नियम से इतर न होकर इस व्यवस्था का ही हिस्सा है। (द हिन्दू, मई 26, 2019)

ऐसा ही एक और फर्जीवाड़ा हमे किसान हित के नाम पर देखने को मिल रहा है, जिसका नाम है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। नाम से तो लगेगा की यह किसानों को फसल नष्ट होने पर ज़रूरी मदद करेगा लेकिन इसकी असलियत बेहद दुखदायी और खतरनाक है।

किसान के नाम पर शुरू हुई यह योजना अंत में हर बार की तरह ही वित्तीय पूँजी की लिए अमृत साबित हुई। अपने 2 साल के जीवन में इस योजना से 10 निजी बीमा कंपनी ने प्राप्त प्रीमियम और हरजाने की रक़म अदा करने के बीच 16,000 रुपये की बचत कर ली है। पहले इन 10 कंपनियों के नाम सुन लेते हैं, आई.सी.आई.सी आई लोम्बार्ड, रिलायंस, टाटा-ए. आई.जी, यूनिवर्सल, बजाज अलायन्स, फ्यूचर, एसबीआई, एचडीएफसी, इफको टोकियो और चोलामंडलम यानी भारत की करीब करीब पूरी वितीय पूंजी का कार्टेल।

चूंकि बीमा क्षेत्र में एक वित्तीय वर्ष में प्रीमियम से पाई गई रक़म और हर्ज़ाने के रूप में दिया गया मुआवज़ा के से बची रकम को सीधा मुनाफा नही कहा जाता तो हम किसी और बढ़िया शब्द के अभाव में इसे खैरात कहने पर मज़बूर है। एक साल मैं इस खैरात की रक़म 16000 करोड़ थी।

चौंकाने वाली बात यह है कि जहां साल 2016-17 में इन कंपनियों ने 17902.47 करोड़ मुआवज़े के तौर पर दिया था वहीं साल 2017-18 में इन कंपनियों ने 2,000 करोड़ रूपये कम मुआवज़ा दिया। 

2017 और 18 वर्ष का आंकड़ा हमारे पास है जो दर्शाता है कि इन दो वर्षों में भाजपा शासित प्रदेशो में ही 68 लाख से ज्यादा किसानों ने इस स्कीम से खुद को अलग कर लिया या अपना पिंड छुड़ा लिया। यह जानकारी हरियाणा स्थित आर. टी.आई कार्यकर्ता श्री पी.पी.कपूर ने मीडिया को दी। उनके अनुसार साल 2016-17 में 5,72,17,159 किसानों ने इस योजना में शिरकत की थी, लेकिन उसके दूसरे साल ही केवल 4,87,70,515 किसान ही इस योजना में रह गये, यानी करीब 84.47 लाख किसानों ने फसल बीमा नही करवाया।

इस योजना के शुरुआत में एक सरकारी कृषि बीमा कम्पनी(Agriculture Insurance Company) भी शामिल थी जिसने 2016-17 में अकेले 7984.56 करोड़ का प्रीमियम ले कर 24,683,612 किसानों की फसल का बीमा किया था और इसमे से 5373.96 करोड़ की राशि का मुवाज़े के रूप में भुगतान भी किया था। लेकिन 2017-18 में सरकार ने अपनी ही कंपनी को इस काम से हटा लिया, सवाल यह भी है की क्यों?

पी. साईनाथ ने इस फसल योजना को राफेल से भी बड़ा घोटाला करार दिया, जो अनिल अम्बानी को फायदा पहुचने के लिए किया गया।

तमिलनाडु से आई मीडिया में रिपोर्ट की माने तो तस्वीर और पीड़ादायिक हो जाती है, जहां मक्के की फसल के 212 रुपये और कपास की फसल के लिए 482 के प्रीमियम देने के बाद किसानों को बीमा इन्शुरन्स कंपनियों से 5, 7 और 10 रुपए मुआवज़े के तौर पर मिले, जो इनको जहर खरीदने के लिए पर्याप्त हैं, शायद यही सोच इन बड़ी देशभक्त कंपनियों की रही होगी। फिर भी इस साल के बजट में इस योजना के लिये 14,000 करोड़ बजट में इस योजना के लिए आवंटित किया गया, जो पिछली बार के मुकाबले 1,000 हज़ार करोड़ ज्यादा है! जबकि इस योजना किसानों के लिये बेकार साबित हुई है

 किसान की आय क्या सचमुच दुगनी हो सकेगी?

2015-16 के बजट भाषण में तात्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सबसे पहले किसानों की आय दुगनी करने की बात की थी, फिर मोदी ने 28 जनवरी 2016 को बरेली उत्तर प्रदेश में किसान रैली को सम्बोधित करते हुए कहा था कि साल 2022 तक किसानों की आय दुगनी हो जाएगी। 2019 के बजट में वर्तमान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2022 तक आय दुगनी करने की बात फिर से की, कहा कि सरकार पूरी तरह से इसे पूरा करने के लिए तैयार है। ‘हमारी सरकार ने बहुत पहले ही महसूस किया कि कृषि क्षेत्र को भारी परिवर्तनकारी कदमों की आवश्यकता है। यह इस संदर्भ में है कि प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की प्रतिबद्धता ली थी। “हमारी सरकार ने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तैयार समिति की सिफारिशों के आधार पर किसानों की आय को दोगुना करने के लिए एक रणनीति विकसित की है” सीतारमण ने यह बात लोकसभा को बताई। वह रणनीति क्या है, इसकी जानकारी उन्होंने जनता को बताना ठीक नहीं समझा। शायद सरकार को इसे सार्वजनिक करने से देश पर खतरा होने की आशंका सता रही हो ?

कोई ठोस बात किये बगैर इस योजना पर काम शुरू भी कर दिया गया, बजट 2019 में सीतारमण ने बड़े वायदे भी किये, लेकिन देखते हैं की आर्थिक सवेक्षण इस बारे में क्या कहता है? सर्वेक्षण में दावा किया गया की किसानों की आय को बढ़ावा देने के लिये सभी खरीफ और रबी की फसलों का  न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में कम से कम डेढ़ गुना वृद्धि करने से किसानों की आमदनी को बढ़ाएगी। सन 1981-82 से थोक मूल्य सूचकांक (WPI) अधिकांश वर्षों में कृषि लगात के मुकाबले कम ही रही है। इसका एक प्रमुख कारण एक सिंचाई, बिजली और कीटनाशकों और उर्वरकों जैसे इनपुट लागत में वृद्धि है।

अगर हम किसानों की औसत आय में वर्षों से कोई इजाफा नहीं हुआ है, बल्कि वह कम हुई है, तो क्या यह कोई आश्चर्यजनक बात है, की किसानों का बड़ा हिस्सा खेती से अलग होना चाहता है?

लेकिन सवाल है कि असल में किसान की आय है कितनी, जिसे दुगना किया जाएगा? जैसा कि हमने पहले देखा की कृषि संबंधी कोई भी ठोस आंकड़ा सरकार ने नहीं जारी किया है, तो आय सम्बन्धी आंकड़े भी अलग अलग हमें मिले। आश्चर्य तब होता अगर हमें सरकार से ही एक आंकड़ा देखने को मिलता  चाहे वह प्रधानमंत्री या उनके संतरी मंत्री के श्रीमुख से ही सुनने को मिलता, लेकिन ऐसा सोचना ही इस राज में मुर्खता है।

अधिकारिक आंकड़ों के अभाव में हमने अलग अलग शोध और रिपोर्ट का रुख किया, ताकि हम समझ पायें की किसान कितना कमाता है। न्यूज़क्लिक साइट ने लिखा कि 12 फरवरी 2019 को लोकसभा में तत्कालीन कृषि एवं किसान कल्याण राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने रखी थी उसके मुताबिक किसानों की प्रति कृषि परिवार औसत आमदनी 2013 में 6426 रुपये प्रति माह थी। इसके अलावा नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस NSSO के मुताबिक 2012-13 में हर कृषि परिवार की औसत मासिक आमदनी भी यही रकम थी यानी 6426 रुपये प्रतिमाह। नाबार्ड की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में किसानों की आमदनी 8931 रुपये प्रति माह हो चुकी थी।

जब सही सही यही नहीं पता की किसान कमाता कितना है, फिर उसकी कमाई को दुगना कैसे किया जाएगा, यह या तो मोदी जी जानते हैं या फिर भगवान? फिर भी अगर 2012-13 के आंकड़े को माने तो किसान की आमदनी 12,800 के करीब होनी चाहिए और नाबार्ड के आंकड़े के हिसाब से करीब 18,000। लेकिन ऐसा होगा कैसे? इस बार पेश बजट पर एक नज़र डालने से पता चल जायेगा कि सरकार किस तरह से इस बड़े कार्यक्रम के लिए तैयारी कर रही है।

बजट में आय दुगनी करने पर कोई ठोस कार्यक्रम नहीं दिया गया। केवल कुछ बातें कही गयी है। हवा हवाई बातें। बातें हर सरकार में होती रही है लेकिन इस तरह की डपोरशंख शास्त्र की महारत इस सरकार ने हासिल की है। मोदी के अनुसार आलू से चिप्स, मक्के से कॉर्नफ़्लेक्स, टमाटर से सॉस बनाने जैसे काम से किसान की आमदनी बढ़ जाएगी, लेकिन यह उन्होंने नहीं बताया की किसान इनका उत्पादन करेंगे कैसे? इन वस्तुओं का निर्माण में लगनी वाली तकनीक और पूंजी किसान कहाँ से लाएगा, जो 50 हज़ार के कर्ज ना चुकाने के कारण आत्म हत्या कर रहा है। मान लिया जाये कि उसने चिप्स और चटनी बना भी दी, फिर उस उत्पाद को बाजार तक ले जाने का तंत्र है क्या? अगर यह होता तो फिर किसान टमाटर को हर साल सड़क पर फैंकने को क्यों मजबूर है, या तो हमारा किसान आलसी है, पागल है या मोदी सरकार जनता को मूर्ख बना रही है।

नीति आयोग ने किसानों की आय दुगनी करने पर जारी रिपोर्ट में खुद माना कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि विकास दर 10.4 फीसदी करना होगा, यह सरकारी आंकड़ा है, लेकिन 2019 में एक गैर सरकारी संस्था के हिसाब से अगर यह लक्ष्य पूरा करना है तो विकास दर 13 प्रतिशत होना चाहिए। सरकारी आंकड़ों का फर्जीवाड़ा हम सभी को पता है, लेकिन फिर भी उनकी माने तब भी अभी विकास की सरकारी रफ्तार भी 3 प्रतिशत है जिसके हिसाब से भी यह लक्ष्य दूर दूर तक हासिल होता नहीं दिख रहा। किसान की  सालाना आमदनी वृद्धि पर नीति आयोग के अनुसार 3.8 है, इस रिपोर्ट के आधार को लें तो भी किसानों की आय दुगनी करने में 25 साल लगेंगे।

असल में इस आय दुगनी करने के पीछे का खेल कुछ और ही है। इस जुमले की आड़ में भारत में कृषि क्षेत्र को बड़े पूँजीपतियों के हवाले करने की कवायद। आय दुगनी करने के नाम पर धीरे से ही सही सरकार कॉन्ट्रैक्ट खेती को बड़े पैमाने पर लाने के लिए यह सारी बातें कही जा रही है।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग: किसानों को पूँजीपतियों के मातहत करना

अनुबंध खेती या कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, को पिछले कुछ वर्षों से किसानों के लिए वरदान और कृषि संकट दूर करने का अचूक मन्त्र के रूप में कॉर्पोरेट और इनके एजेंटों द्वारा पेश किया जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि सरकार की ओर से भी इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि किसानों को इस से जुड़ना चाहिए ताकि वे अपने जीवन में खुशहाली ला सकें। तो क्या यह कॉर्पोरेट फार्मिंग वाकई किसानों के लिए वरदान है?

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का मतलब है एक ऐसा करार जो किसानों और खरीदारों के बीच किया जाता है जिसमे किसान खरीदार के हिसाब से फसल लागता है और उसे उन्हें ही बेच देता है। कई बार इस करार में फसल की गुणवत्ता और मात्रा पहले से ही तय कर दी जाती है। इस पद्दति के समर्थक इसे किसान के पक्ष का करार बताते हैं और इसकी वकालत भी पूंजीपति समर्थक अर्थशास्त्री और राजनेता पूरी दुनिया में कर रहे है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग हिंदुस्तान में कई राज्यों जैसे आंध्रप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, पंजाब और तमिल नाडू में इसे सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। अब मोदी सरकार एक नया कानून लाने जा रही है जिसके तहत इसे पूरे देश में लागु कर दिया जायेगा। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पर हम अपने आने वाले अंक में विस्तार से लिखेंगे, अभी स्थान की कमी के कारण इस विषय पर हम केवल इसके मुख्य बिन्दुओं पर ही खुद को सीमित करेंगे। इस प्रक्रिया में किसान के बदले खरीददार का पक्ष हमेशा मज़बूत रहता है, क्योंकि खरीदने वाला कोई एक आम खरीदार ना हो कर बड़ी कंपनी होती है, जिसके पास धन, बल सभी कुछ होता है, किसी एक किसान के मना करने या उसके साथ कम्पनी के मुताबिक करार ना होने की स्थिति में वह कई और किसान के पास जा सकती है, यही वह करती भी है। कई जगह करार करने के बाद भी किसान से फसल ना खरीदना या पहले से तय दाम से कम दाम पर फसल खरीदना इन कम्पनियों की आम आदत है। एक बार करार हो जाने के बाद किसान कम्पनी के चंगुल में चला जाता है और फिर उसे कम्पनी के मुताबिक ही फसल और खेती करनी होती है, आज तक का जो भी उदाहरण हमारे सामने है, उसमे करार हमेशा कम्पनी के पक्ष का ही होता है, किसान एक तरह से उस कम्पनी का मुलाजिम होने पर मजबूर हो जाता है, और कम्पनी किसी भी बहाने से (जिसमे फसल की गुणवत्ता कम्पनी के मुताबिक ना होने सबसे ज्यादा बार इस्तेमाल किया गया) करार को तोड़ सकती है। इस तरीके को ही यह सरकार लाने जा रही है, मतलब किसान को अब बड़े पूंजीपतियों के हवाले कर दिया जायेगा। कुछ कुछ नील की खेती की तरह का अनुबंध कम्पनियां करेंगी और किसान उस पर चलने को मजबूर होगा। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में पूंजीपति आयें इसके लिये सरकार कई कदम की घोषणा करने वाली है, जिस पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे।

बजट 2019 में क्या कहा गया?

वित्त मंत्री के भाषण में जोर देकर कहा कि “”गाँव, गरीब और किसानसरकार की सुधार पहलों के केंद्र में हैं, लेकिन उनके पूरे बजट में कुछ भी ठोस नहीं कहा, जो यह दिखता की सरकार का इरादा सच में कुछ करने का है, और घड़ियाली आँसू नहीं।

जहां तक वित्तीय आवंटन का सवाल है, कृषि और संबद्ध गतिविधियों से संबंधित दो मंत्रालयों को सामूहिक रूप से 2019-20 में 1,42,299 करोड़ रुपये आवंटित किए गए जो 2018-19 में उनके आवंटन से 80% अधिक है। इस आवंटन करीब आधा हिस्सा यानी 55,000 करोड़ रुपये प्रधानमंत्री “सुनिश्चित आय सहायता’ योजना और 900 करोड़ प्रधानमंत्री किसान पेंशन योजना को लागु करने के लिये दिया गया है। मतलब की असल कृषि सम्बंधित काम के लिये कोई बजट में प्रावधान नहीं है। सुनिश्चित आय योजना के तहत हर साल किसान को 6 हज़ार रूपये मिलेंगे यानी केवल 500 रूपये प्रति माह, अब इन पैसों में वह क्या करेगा क्या बचायेगा? और यह रकम केवल उन्हीं को मिलेगी जिनके नाम पर खेत है, मतलब ठेके पर खेत ले कर किसानी करने वाले, और खेत मजदूर इस योजना से बाहर रहेंगे!

नई योजनाओं के संदर्भ में, बजट में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य मत्स्य पालन और उद्योग में मजबूत ढांचे को विकसित करना और मूल्य संबंधी मामलों की खामियों को दूर किया जायेगा, साथ ही बांस, शहद और वस्त्र के आसपास के पारंपरिक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए योजना बनाई जाएगी। वित्त मंत्री ने “कृषि अवसंरचना में व्यापक रूप से निवेश” करने का वादा किया और कहा कि सरकार खेती के मूल पर वापस जाएगी: शून्य बजट प्राकृतिक खेती के द्वारा। इस तरह के कदम हमारे किसानों की आय को हमारी आजादी के 75 वें साल में दोगुना करने में मदद कर सकते हैं। ” शून्य बजट प्राकृतिक खेती एक कृषि पद्धति है जिसमे रासायनिक उर्वरकों के बजाय प्राथमिक मिट्टी के पोषक तत्वों के रूप में गाय के गोबर, मूत्र और गुड़ के मिश्रण पर निर्भर करती है। इस पद्दति का कई जगहों पर इस्तेमाल भी किया जा रहा है,

पर अभी भी शून्य बजट प्राकृतिक खेती के उपर कोई भी गंभीर शोध नहीं हुए हैं, और यह बड़े क्षेत्र में कितनी कारगर साबित होगी इस पर कोई आंकड़े नहीं हैं। शून्य बजट प्राकृतिक खेती, आर्गेनिक खेती इत्यादि अत्यधिक रसायन से हुई मिटटी और खेती को हानि को बचाने के तौर पर कई जगह प्रयोग में हैं, पर उनसे किसान की आमदनी दुगनी नहीं हो सकती इन पद्दतियों को अपनाने से किसान की लागत ज़रूर कम हो सकती है, वह भी तब जब इनका वैज्ञानिक तौर पर शोध हो और इनके विकास और इस्तेमाल के तरीकों पर एक मानक तैयार हो। बजट में इस पद्धति के विकास और मानकीकरण पर कितनी रकम आवंटित की गई है? मात्र 325 करोड़, और वहीं दूसरी ओर खाद सब्सिडी बढ़ा कर 9,900 करोड़ कर दी गयी। सरकार क्या कह रही है और क्या कर रही है, इस बात को बताने की ज़रूरत नहीं है।

खाद और अन्य सब्सिड़ी किसान के नाम पर जाती है सीधे खाद और अन्य सामान बनाने वाली कम्पनी को। खाद की कीमत कम रहे इसके मद में खर्च किये गए पैसे भी कृषि खाते में ही जाते हैं। सरकारी खाद कंपनियों का दिवाला पिटवा दिया गया था, आज अधिकतर बंद पड़ी हैं या बंद होने के करीब हैं, 1990 के बाद से ही सरकारी उपक्रमों को बंद करने का सिलसिला शुरू हुआ, जो मोदी सरकार आने के बाद तेज़ गति प्राप्त कर चुका है। इस सरकार ने सार्वजनिक तौर पर घोषणा कर दी है की वो सभी सरकारी कम्पनियों को या तो बेच देगी या उन्हें बंद कर देगी। मतलब यह 99,000 करोड़ की विशाल रकम सरकार पूंजीपतियों को देगी। यह है इस सरकार का किसान प्रेम! सरकार ने आय बढ़ाने के लिये दस हज़ार किसान उत्पादक संगठन भी खोलने का ऐलान किया, यह कैसे काम करेंगे, और कब शुरू होंगे इस पर हर बात की तरह कोई बात नहीं की गयी है। मतलब यह एक और नया जुमला है।

कृषि संकट और पूँजीवाद

भारत के कृषि क्षेत्र में भी विश्व पूँजी के प्रभाव को देखा जा सकता है– खाद्यान्नों की कीमत जहाँ उपभोगताओं के लिये आसमान छू रही है, वहीं किसानों को लगत मूल्य भी नहीं मिल पा रहा। निर्यात फसलों की खेती बढ़ती जा रही है और खाद्यानों की खेती कम, ठेका खेती को सरकार केवल पूंजीपतियों के फायदे के लिये प्रोत्साहित कर रही है, अनाज व्यापार पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वर्चस्व पूरी तरह से कायम हो छुआ है, सरकारों द्वारा कृषि क्षेत्र में निवेश और खर्च में तेजी से कटौती की है और सब्सिडी भी बड़े पूंजीपतियों के लिये दे रही है, इन सबका असर हमें दिख रहा है, एक तरफ किसानों बर्बाद हो रहा है वहीं दूसरी तरफ अनाज, चीनी, दाल और अन्य जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमतें आम आदमी की पँहुच से बहार होती जा रही है। पूरा कृषि संकट असल में पूंजीवादी व्यवस्था की गतिकी के कारण है, और इसका समाधान इस व्यवस्था के भीतर हो नहीं सकता। जब तक किसान और कृषि को बाज़ार और पूंजीपतियों से मुक्त नहीं कराया जाता यह संकट गहराता ही जायेगा। पूंजीवादी व्यवस्था के हिमायती अर्थशास्त्री और विश्लेषक इसके संकट का कारण एम्एसपी और ऋणमाफ़ी में देखते हैं, लेकिन यह एक लक्षण मात्र है, बीमारी और बड़ी है।

कृषि–विज्ञान के क्षेत्र में नयी–नयी खोजों के कारण आज हम उस मुकाम तक पहुँच गये हैं कि दुनिया के हर व्यक्ति को अच्छा और पोषक भोजन मिलना आसानी से सम्भव है, लेकिन मुनाफ़े की हवस इस उपलब्धि को गरीब मेहनतकश तक पहुँचने देना नहीं चाहती वो एक बाधा बन कर उभर चुकी है। पूंजीपतियों द्वारा संचालित और निर्देशित कृषि व्यवस्था केवल मुनाफ़े के लिये चलाई जा रही है इसका ही परिणाम है– आम किसानों की बर्बादी और खेती का संकटग्रस्त होसतत संकट के चक्र में फँस जाना।