कविता बन जाती हथियार

This Poem by Pankaj Prasoon salutes the undying revolutionary spirit of the people who rose against the exploitative order.

Our REVOLUTIONARY RED SALUTE to all those martyrs who gave supreme sacrifice for the cause of Equality, Freedom and for an exploitation free world.

  

कविता बन जाती हथियार 

पंकज प्रसून 

 

कविता बन जाती हथियार

तानाशाही, राजशाही के खिलाफ

ट्यूनीशिया,मिस्र और सीरिया में

यमन,बहरीन और मलयेशिआ में

आज़ादी का परचम लहरानेवालो में

जिन्होंने क्रांति का संगीत रचा

अलग से सुर-ताल में

अन्याय के ख़िलाफ

शोषण के ख़िलाफ

उनके ख़िलाफ जो कहते हैं –सच मर जायेगा

वह कहती है –सच रहेगा ज़िंदा हमेशा

इज़्ज़त के ज़िंदगी के लिये

सपना देखा आशा के वसंत का

उस मादक वसन्त का अभिनंदन

सलाम

आओ करें सलाम उन्हें

जो कत्ल हो गये सच की ख़ातिर

सलाम  ज़ंज विद्रोह को

अली इब्न मुहम्मद को

जिसने हिला दी थी चूलें

ईरान से इराक़ तक

निरंकुश बेपरवाह, बेखौफ़ बादशाहों की

नौवीं सदी में

सन् १५७० 

सलाम यान्गा को !

अफीका के गाबों से लाया गया गुलाम

यान्ग बारा के राजा का  बेटा था वह

जिसने संघर्ष किया अपने साथी गुलामों के साथ

स्पेनी उपनिवेशवादियों से

परास्त किया उन्हें मेक्सिको की धरती पर

स्थापित किया गुलामों का अपना आज़ाद नगर

यान्गा को सौ बार सलाम !

 

सन् १७१२ 

गोरों की नृशंस ग़ुलामी

जब हो गयी बर्दाश्त के बाहर

न्यू यार्क के कुछ अश्वेत ग़ुलाम

आगे बढ़े, हिम्मत किया

गोलियों से भून दिया नौ गोरों को

तब गोरों ने मँगवाये भाड़े के गुंडे

पकड़ लिया उन बेचारों को

झोंक दिया २१ जनों को

जलती हुई आग में

वह था पहला गुलाम विद्रोह

उन २१ शहीद गुलामों को सलाम !

सन् १७५७ 

शुरू किया विद्रोह फ़कीरों और सन्यासियों ने

कंपनी सरकार के खिलाफ़

दशनामी नागा सन्यासियों और मदारी सूफ़ियों ने

डेढ़ सौ फ़क़ीर मारे गये

उन साधुओं और फ़कीरों को सलाम !

सन् १७९८ 

मिदनापुर, बांकुड़ा और जंगलमहाल

वन प्रांतर में आग लग गयी

वन वासियों ने उठा लिये अपने तीर-कमान

उन्हें कहा गया चुहार

सामंतों, उपनिवेशवाड़ियों ने

नाम दिया चुहार विद्रोह

उस वीर पुरुष

दुर्जन सिंह को सलाम !

सन्१८०६ से १८१६ 

दस वर्षों तक

मिदनापुर के साल वनों में

लगी धधकने क्रांति की ज्वाला

जनता के दुश्मनों ने सारे-आम हत्या कर दी

उन वीरों की

शहीद अचल सिन्हा और उनके साथ हुए २०० शहीद

उन सभी को सलाम !

सन् १७८४ 

जोहार

बाबा तिलका मांझी !

भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी

साम्राज्यवाद से लड़ने वाले पहले योद्धा

पहली जंग जिन्होने छेड़ी

तीर-धनुष से आज़ादी की पहली कविता लिखी जिन्होने

और जिन्हे हम भूल गये

सन् १७८७ 

धनपतियों के खिलाफ़

मस्साचुसेट्स की धन-गलियों में

धनपतियों की नींद उड़ानेवाले

डेनियल शेज़ के शेज़ विद्रोह को

सलाम

जो सन् २०११ में उभरा फिर से

न्यू यार्क के मदमस्त, कुख्यात धन-सेठों से पटी

“क़ब्ज़ा कर लो वाल स्ट्रीट “

जनाक्रोश के रूप में

सन् १८२९ 

 

जोहार

तिरोत सिंह !

नॉंगखलाउ,मेघालय के

क्रांतिकारी शहीद

सुरमा से ब्रह्मपुत्र की ज़मीन हड़पने

ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की साजिश को

नाकाम करने की हिम्मत करने वाले

सन् १८५८ 

 

जोहार

नारायण सिंह !

१८५६ के अकाल में

सोनाख़ान,छत्तीसगढ़ के ज़मींदारों ने अपने गोदामों में

छुपा रखे थे अनाज लूट कर ग़रीबों से

नारायण सिंह ने लूट लिया उन गोदामों को

फ़िर बाँट दिया उसे ग़रीबों में

सामंतों और उपनिवेशवादियों ने उन्हें अपना दुश्मन माना

और सरेआम फाँसी दे दी उनको

सन् १८६२ 

 

जोहार जैन्तिया के किआन्ग नोंगवा को !

पान-सुपारी विद्रोह के अगुआ

लटका दिया अँग्रेज़ी हुकूमत ने उन्हें फाँसी पर

फाँसी का फँदा लगने से पहले उन्होने किया जयघोष :

फाँसी के बाद अगर

मेरा सर घूम गया पूरब 

तो समझो सौ साल के भीतर  

हो जायेगा देश आज़ाद “

सन् १८८५ 

 

जोहार चार भाइयों को

भगनाडीह, दुमका के

सिद्धो, कान्हु, चाँद, भैरव को

चार मुर्मू भाई

क्रांतिकारी

सूदखोर महाजन

भ्रष्ट ज़मींदारों के खिलाफ

आज़ादी की दीवानगी में चारों ने दे दी

अपने प्राणों की आहुति

वह था हुल 

यानी क्रांति!

संताल विद्रोह

सन् १८७१ 

 

सलाम

कांगो के

उन ६०० लोगों को !

जिन्हें नयांगवा बाज़ार में

गुलामों की तिज़ारत करनेवाले

चार अरब सौदागरों ने

बीच चौराहे पर भून

सन् १९०० 

 

Dharti Abba Bira Munda

बहने लगी क्रांति की धारा

गर्म लावा

बिरसा मुंडा का उलगुलान

ब्रिटिश हुकूमत

गयी चरमरा

झारखंड में

क्रांति का दूसरा नाम

उलगुलान  !

२२ जनवरी १९०५ 

 

पादरी ग्योर्गी हापोन को

ज़द्रास्तवूयतीए

सलाम

मज़दूरों की बदहाली देख न सका वह

ज़ारशाही रूस

बदमिज़ाज़, क्रूर, निरंकुश

ज़ार निकोलस का ज़माना था

शाही फरमान हुआ जारी –

करेंगे मज़दूर अब से

ग्यारह घंटे काम

और शनिवार को दस घंटे

सामानों की कीमतें बढ़ा दी

महंगाई बढ़ा दी

मज़दूरी घटा दी

हापोन ने समझा

ज़ार को सही खबर नहीं

उसे पता नहीं –

काम है यह उसके कारिंदों का !

कितना भोला था वह

हुआ नहीं उसे बर्दाश्त

मज़दूरों

को किया एकजुट

निकल पड़े सब

लाखों की तादाद में

ज़ार के शरद महल की ओर

जहाँ लगीं होने उन पर गोलियों की बौछार

मारे गये मज़दूर हज़ार

वह क्रांति हो गयी असफल

पर पड़ गयी नींव

विराट क्रांति की

जन्म हो गया उस क्रांति का

जिसने हिला दी चूलें

दर्ज़नों तानाशाहों और राजाओं की

२५ अक्तूबर १९१७

वह क्रांति-

बीसवीं सदी की सबसे बड़ी

मज़दूरों और किसानों की

दुनिया की सबसे बड़ी क्रांति !

अक्तूबर क्रांति !!

लाल क्रांति !!!

सूत्रधार थे जिसके लेनिन और स्तालिन

उस क्रांति को लाल सलाम !

क्रांति की इस नयी कविता में जुड़ते चले गये

सैकड़ों सफे

लाल सफे

रूस, चीन, आधा यूरोप

कूबा, वीयतनाम …

हो गये लाल

इन सबको सलाम

सन् १९२१ 

 

तुर्की में क्रांति फ़ैल गयी

इस्तांबुल की गलियों में

घूमने लगे आज़ादी के दीवाने

जिनके नायक थे मुस्तफ़ा सूफ़ी

तानाशाही के क़ारिंदों ने

छुरा घोंप कर मार दिया जिनको

और फेंक दिया काले सागर में

काला सागर हो गया लाल

मुस्तफ़ा सूफ़ी को

मरहबा

सलाम !

सन् १९२३ 

 

आंध्र प्रदेश में आज़ादी की चिनगारी

दावानल में तब्दील हो गयी

चिंतापल्ली के

अलूरी सीतारामा राजू को सलाम

रम्पा विद्रोह को सलाम !

सन् १९५२ 

 

कीनिया के जंगलों और गाँवॉं से उठने लगी आवाज़ें

मुजुन्गु आइन्दे उलाया

मवफिका अपाते उहुरु

भागो यूरोपी, भागो

अफ्रीका को रहने दो आज़ाद

बच्चे-बूढ़े कहने लगे-

उमा उमा

भागो भागो

जो बन गया माउ माउ विद्रोह

उन कापेंगुरिया -छह को सलाम !

 

१७जनवरी १९६१  

 

अफ्रीकी अस्मिता की लड़ाई में शहीद

कांगो के पहले निर्वाचित प्रधान मंत्री

पात्रीस लूमूम्बा को सलाम

उनकी लाश तक को अम्ल में गला कर साफ़ कर दिया था

ज़ालिमों ने गोरे

उपनिवेशवादी

अमरीकी और बेल्जियम ने

वही जो अब लोकतंत्र के पहरेदार हैं

जिन्हें धिक्कार है

११ सितंबर १९७३ 

 

चीले स्टेडियम में

कटी हुई अंगुलियों से बहते खून से

अपनी ज़िंदगी की आख़िरी कविता लिखनेवाले

बीक्तर हारा को सलाम !

उसकी वह कविता असमाप्त रह गयी

वह कविता लिख रहा था

उस पर दनादन गोलियाँ चल रहीं थीं

वह लिख रहा था-

कितना कठिन है सहज गीत गाना

जब मुझे खौफ़ का गीत गाना है

खामोशी और चीखें

मेरी कविता का अंत हैं

१७ दिसंबर २०१० 

 

पुलिस ज़ुल्म

और भ्रष्टाचार से आकर तंग

जल मरा

ट्यूनीशिया के शहर सिदी बुज़ीद का

मुहम्मद बुअज़ीज़ी

पढ़ा-लिखा था

बेरोज़गार था

फल बेचता था सड़कों पर

तंग आ गया था पुलिस को हफ़्ता दे-.दे कर

छह भाई-बहनों का परिवार चलाता था

मुहल्ले भर का प्यारा था

प्यार से सब उसे बसबूसा कहते थे

बसबूसा यानी मीठा हलवा

पुलिस ने उसके ठेले को जब्त कर लिया

और कहा- पैसे दो वरना

नहीं मिलेगा ठेला तेरा

वह रहा खामोश

चुपचाप लाया मिट्टी का तेल

सारे आम बीच बाज़ार

नहा लिया उस तेल से

और आग लगा ली खुद को

जल मरा वह

लेकिन आग सुलग गयी पूरे  देश में

लाखों लोग उतर आये सड़कों पर

और पलट दिया तख़्ता तानाशाह बेन अली का

सुलग उठा पूरा अरब

शुरू हो गयी अरब क्रांति

यास्मिन क्रांति

अरब वसंत

बुअज़ीज़ी को सलाम !

१७ जून २०११ 

मारिटेनिया के याक़ूब दाऊद को सलाम !

राजधानी नवाकशौत- हवाओं की जगह

राष्ट्रपति निवास के सामने

ख़ुद को जला कर आत्महत्या की

फिर हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आये

और क्रांति शुरू हो गयी

पूरे अरब में …

मिस्र में

असमा महफूज़ को सलाम !

सीरिया में

रज़ान जैतूना को सलाम !

यमन में

नवाकुल करमान को सलाम !

क्रांति की आग कभी बुझती नहीं

दबा दी जा सकती है

थोड़ी देर के लिये

पर वह  सुलगती रहती है

अंदर ही अंदर

कविता कभी झुकती नहीं

साथ देती है  हमेशा

क्रांति का, सबसे आगे

क्रांति ख़त्म कहाँ हुई है

जारी है अब तक

कविता भी अधूरी है

जाने कब होगी वह पूरी

क्रांति-गाथा में जुड़ते जायेंगे

जाने कितने नाम

उन सबको सलाम !

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