नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amemndment Bill): भारत को हिन्दू राष्ट्र और दो राष्ट्र सिद्धांत को वैध बनाने की दिशा में एक और कदम

नागरिकता संशोधन विधेयक को कैबिनेट ने मंज़ूरी दे दी और संसद में यह पास भी हो जायेगा।

इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद भारत की नागरिकता का मुख्य आधार व्यक्ति का धर्म होगा ना की उसकी कोई और बात। यह बिल भाजपा – आरएसएस की लाइन के मुताबिक बनाया गया है, जिन्हें भारत को एक हिन्दू राष्ट्र के तौर पर पेश करना है।

संसद में संख्या के आधार पर वे इस बिल को पास करवा भी लेंगे और सोशल मीडिया और चरण मीडिया में उनके समर्थक इसे देशभक्त सरकार की एक और उपलब्धि तथा सदियों से गैर-मुसलमानों खास कर के हिन्दुओं पर हुए अत्याचार को ख़तम करने वाला क़दम के तौर पर पेश करने में लग जायेंगे।
यह बिल इस बात की भी पुष्टि कर देगा की भारत सरकार ने 70 साल बाद दो राष्ट्र सिद्धांत को आखिरकार मान लिया। दो राष्ट्र सिद्धांत या दो क़ौमी सिद्धांत, के मुताबिक हिन्दू और मुसलामन एक राष्ट्र नहीं है बल्कि दो अलग अलग राष्ट्र है, और वे एक साथ नहीं रह सकते।

इसी सिद्धांत के अंतर्गत, जिन्ना और मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान बनाने की बात की थी। इसी सिद्धांत के तहत भारत का बटवारा हुआ और पाकिस्तान एक इस्लामिक गणराज्य के तौर पर दुनिया में आया।

यह बात गौर करने की है कि कांग्रेस, समाजवादी और कम्युनिस्टों ने इस सिद्धांत को सिरे से ख़ारिज कर दिया था।
जहाँ मुसलमानों की प्रतिनिधित्व करने वाली इकबाल, जिन्ना वाली लीग इस को केंद्र में रख कर अपनी राजनीति कर रही थी, वहीं दूसरी और इस सिद्धांत की वकालत आरएसएस और हिन्दू महासभा भी कर रही थी।

बीएस मुंजे, भाई परमानंद, विनायक दामोदर सावरकर, एमएस गोलवलकर और अन्य हिंदू राष्ट्रवादियों के अनुसार भी दो राष्ट्र सिद्धांत सही था और वे भी हिन्दू मुसलमानों को अपना अलग अलग देश की वकालत कर रहे थे, उन्होंने न केवल इस सिद्धांत की वकालत की बल्कि आक्रामक रूप से यह मांग भी उठाई कि भारत हिन्दू राष्ट्र है जहाँ मुसलमानों का कोई स्थान नहीं है। भारत विभाजन में जितना योगदान लीग का रहा उससे कम आरएसएस और हिन्दू दलों का नहीं था। आज राष्ट्रवाद और अखंड भारत का सर्टिफिकेट बांटने वाले भी देश के बंटवारे में लीग जितना ही शरीक थे, यह बात हमे नहीं भूलनी चाहिए।

हिन्दू महासभा के संस्थापक राजनारायण बसु ने तो 19वीं शताब्दी में ही हिन्दू राष्ट्र और दो राष्ट्र का सिद्धांत पर अपनी प्रस्थापना रखनी शुरू कर दी थी। हिन्दू राष्ट्र के बारे में उन्होंने कहा था, “सर्वश्रेष्ठ व पराक्रमी हिंदू राष्ट्र नींद से जाग गया है और आध्यात्मिक बल के साथ विकास की ओर बढ़ रहा है। मैं देखता हूं कि फिर से जागृत यह राष्ट्र अपने ज्ञान, आध्यात्मिकता और संस्कृति के आलोक से संसार को दोबारा प्रकाशमान कर रहा है। हिंदू राष्ट्र की प्रभुता एक बार फिर सारे संसार में स्थापित हो रही है।”

बासु के ही साथी नभा गोपाल मित्रा ने राष्ट्रीय हिंदू सोसायटी बनाई और एक अख़बार भी प्रकशित करना शुरू किया था, इसमें उन्होंने लिखा था, “भारत में राष्ट्रीय एकता की बुनियाद ही हिंदू धर्म है। यह हिंदू राष्ट्रवाद स्थानीय स्तर पर व भाषा में अंतर होने के बावजूद भारत के प्रत्येक हिंदू को अपने में समाहित कर लेता है।”

दो राष्ट्र का सिद्धांत फिर किस ने दिया इस पर हिंदुत्व कैंप के इतिहासकार कहे जाने वाले आरसी मजुमदार ने लिखा, “नभा गोपाल ने जिन्नाह के दो कौमी नजरिये को आधी सदी से भी पहले प्रस्तुत कर दिया था।”

बाद में इन्हीं विचारों को लेकर हेडगेवार, मुंजे और सावरकर हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को आक्रामक रूप से लागू करने पर काम भी करना शुरू कर दिया। मुंजे ने 1923 में ही हिन्दू महासभा के अधिवेशन में कहा कि “जैसे इंग्लैंड अंगरेजों का, फ्रांस फ्रांसीसियों का तथा जर्मनी, जर्मन नागरिकों का है, वैसे ही भारत हिंदुओं का है। अगर हिंदू संगठित हो जाते हैं तो वे अंगरजों और उनके पिट्ठुओं, मुसलमानों को वश में कर सकते हैं। अब के बाद हिन्दू अपना संसार बनाएंगे और शुद्धि तथा संगठन के दुवारा फले-फूलेंगे।”

लेकिन वे शायद भूल गए थे, कि इंग्लैंड, फ्रांस जर्मन राष्ट्र की पहचान किसी धर्म से नहीं थी। हालाँकि उनके गुरु हिटलर ने जर्मनी में आर्यन राज्य की कल्पना पर आधारित राष्ट्र का निर्माण करने के बात की थी, यहूदियों और अन्य गैर आर्यन नस्लों का सामूहिक नाश जैसी मानवद्रोही कुकृत्य सामने आया। हिन्दुत्ववादी ताक़तें भी कुछ इसी तरह की कामना भारत के लिए भी रखती है।
नागरिकता संशोधन विधेयक, नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों में बदलाव करेगा।

नागरिकता बिल में इस संशोधन से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हिंदुओं के साथ ही सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों के लिए बगैर वैध दस्तावेजों के भी भारतीय नागरिकता हासिल करने का रास्ता साफ हो जाएगा। भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए देश में 11 साल निवास करने वाले लोग योग्य होते हैं। नागरिकता संशोधन बिल में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के शरणार्थियों के लिए निवास अवधि की बाध्यता को 11 साल से घटाकर 6 साल करने का प्रावधान है।

सरकार का मानना है कि इन देशों में हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे हैं और उनको सरकार द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है, ऐसे में भारत का यह दाइत्व बनता है की हिन्दुओं की रक्षा करे। सरकार इस बात से पूरी तरह बेखबर है की भारत के कई पडोसी राज्यों में मुसलमान अल्पसंख्यक है और उनके साथ भी वहाँ के बहुसंख्यक जमात द्वारा ज़ुल्म की खबर समय समय पर आती रहती है।

श्री लंका में तो सिंघली और तमिल (हिन्दू) के बीच दशकों से लगातार तनाव बना रहा है। तो क्या सभी तमिल जनता अब भारत आ सकती है? वही हाल बांग्लादेश और म्यांमार के गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों का है, तो क्या इन सभी को भारत अपना नागरिक बनाने के लिए तैयार है? और हाँ, तो फिर इन गैर-मुस्लिम शरणार्थी और सताए जा रहे मुस्लिम शरणार्थी जैसे रोहिंग्या, पाकिस्तान में शिया, अहमदिया, अफगानिस्तान के हजारा, उज़बेक इत्यादि के साथ यह सौतेला व्यव्हार क्यों? सरकार को इस पर भी जवाब देना होगा।

रोहिंग्या के साथ साथ भारत में म्यांमार से चिन शरणार्थी भी बहुसंख्या में भारत में निवास कर रहे हैं, अफगानिस्तान से आये शरणार्थी को भारत ने पनाह दी थी, उस पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया होगी?

क्या इस बिल से यह बात साबित नहीं हो जाती कि सरकार केवल हिन्दू भावना से खेल रही है, और उसका असली मकसद मुस्लिम समुदाय को किनारे करने का है, जैसा की जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों के साथ किया था?

भारतीय संविधान के अनुछेद 14 कहता है कि

किसी भी व्यक्ति को, विधि के समक्ष समानता का अधिकार होगा

और अनुछेद 15 बतलाता है कि

राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध के केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।

यह बिल इन दोनों प्रावधानों के न केवल खिलाफ है बल्कि यह संविधान की मूल भावना के विरोध में भी है।

अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा, कहती है कि, सभी को इस घोषणा में सन्निहित सभी अधिकरों और आजादियों को प्राप्त करने का हक है और इस मामले में जाति, वर्ण, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य विचार-प्रणाली, किसी देश या समाज विशेष में जन्म, संपत्ति या किसी प्रकार की अन्य मर्यादा आदि के कारण भेदभाव का विचार न किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, चाहे कोई देश या प्रदेश स्वतंत्र हो, संरक्षित हो, या स्वशासन रहित हो, या परिमित प्रभुसत्ता वाला हो, उस देश या प्रदेश की राजनैतिक क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के आधार पर वहां के निवासियों के प्रति कोई फ़रक न रखा जाएगा।
अब विचार करें की क्या इस प्रकार का बिल एक धर्म को मानने वालों के खिलाफ नहीं है? और अगर कोई नास्तिक है तो क्या उसे भारत की नागरिकता नहीं मिलेगी?

फिर, यह किस तरह पता लगेगा की किसी व्यक्ति के खिलाफ़ धर्म के आधार पर इन देशों में कार्यवाही हुई है, पाकिस्तान, म्यांमार श्री लंका या कोई भी देश हो, यह कोई नहीं स्वीकारता की उनके यहाँ धार्मिक आधार पर लोगों का उत्पीडन होता है।

यह बिल पूरी तरह से संकीर्णतावादी होने के साथ साथ देश में सोहार्द के वातावरण को ख़त्म करने वाला है।

झारखण्ड चुनाव और जनता

–दामोदर


राज्य की आम जनता के लिए विकास विनाश का रूप ले चुका है। राज्य में भूख से पिछले 3 सालों में 23 लोगों के मरने की खबर आई है, असल में यह संख्या कहीं अधिक होगी। कुपोषण के मामले में भी राज्य अव्वल है, पांच वर्ष से कम उम्र के आधे से अधिक बच्चे कुपोषित हैं और इनमें से 12 प्रतिशत गंभीर रूप से कुपोषित हैं। परिणामस्वरूप तीन वर्ष से कम उम्र के लगभग आधे बच्चे ठिगनेपन से ग्रसित हैं।

झारखण्ड में सिर्फ 81 सीटें हैं लेकिन राज्य मे चुनाव की अवधि करीब करीब 1 महीने की है। चुनाव नीरस और उक्ता देनेवाला साबित हो रहा है।

राज्य में वैसे पार्टियों की कमी नहीं है, और करीब करीब सभी दलों ने अपने उम्मेदवार मैदान में उतारे हैं।

कांग्रेस महाराष्ट्र को दोहराने की उम्मीद में है, तो वहीं भाजपा अपनी पूरी ताकत इस राज्य में झोंक चुकी है।

अन्य क्षेत्रीय दल भी चुनाव के बाद त्रिशंकु विधान सभा की उम्मीद देख कर आस लगा बैठे है, कि अगर उनकी उम्मीद के मुताबिक त्रिशंकु विधान सभा बनी तो उनकी पूछ और अन्य सुविधाओं का कोई जवाब ही नहीं होगा।

एक समय राज्य में वाम दलों की स्थिति अच्छी रहती थी, खास कर के मार्क्सवादी समन्वय समिति, भाकपा, और लिबरेशन की मज़बूत पकड़ कई इलाकों में थी।

राज्य के बनने के बाद से भाजपा ने इस राज्य पर सबसे ज्यादा शासन किया, लेकिन क्या भाजपा क्या कांग्रेस या जेएमएम सभी के राज में जनता का विनाश ही हुआ।

आज हालत यह है कि प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर होने के बावजूद राज्य हर आर्थिक पैमाने पर देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक है, वह तब जब की इस राज्य में भारत का करीब ४० फीसदी सम्पदा का भंडार है।

तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में , ग्रामीण और शहरी गरीबी का स्तर सभी बड़े राज्यों में सबसे ज्यादा है। हालाँकि बाद के सरकारी आंकड़े यह भी बताते हैं की राज्य में गरीबी रेखा से ऊपर आये लोगों की संख्या अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा है, लेकिन वहीं दूसरी ओर आज भी राज्य के 46% गरीबी रेखा से नीचे अपना जीवन जी रही है।

लेकिन फिर भी सरकार कह रही है कि राज्य में विकास हो रहा है। इसी विकास के कारण राज्य के करीब 65 लाख लोग, Indian People’s Tribunal on Environment and Human Rights, की 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक विस्थापित हो गए। 2019 तक कितने हुए इसका आंकड़ा हमारे पास नहीं है, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि इस संख्या में वृद्धि ही हुई होगी, कमी होने की सम्भावना हो ही नहीं सकती, क्योंकि सरकार देश के विकास के लिए कमर कसे हुई है।

पिछले साल गोड्डा में अदानी द्वारा 1600 मेगावाट की बिजली परियोजना की शुरुआत की गयी थी, जिसके लिए 11 गांवों से करीब 2300 एकड़ ज़मीन ली गयी। इस परियोजना का स्थनीय लोगों द्वारा जम कर विरोध किया गया और प्रशासन से झड़प और मुठभेड़ भी हुई। लेकिन अधिकतर ज़मीन थी ब्राह्मणों और पटेलों की, जिनका कृषि से सम्बन्ध लगभग ख़त्म हो चुका है, उन्हें 49 लाख एकड़ के रेट से मुआवजा मिला तो फिर देशभक्ति की भावना क्यों न जागती, ज़मीन अदानी को बिलजी उत्पादन करने के लिए दे दिया, बिजली पैदा होगी झारखण्ड में, कोयला आएगा ऑस्ट्रेलिया से और बिजली को बेचा जायेगा बांग्लादेश को, मुनाफा मिलेगा अदानी को, अब सोचिये आखिर राज्य की जनता को क्या मिला? इस तरह के कई विकास झारखण्ड में देखे जा सकते हैं।

जहाँ एक तरफ इस तरह का विकास हो रहा है, वहीं दूसरी ओर धनबाद, बोकारो जैसे पुराने औद्योगिक शहर खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। एक समय बोकारो तेज़ी से बढ़ता हुआ औद्योगिक शहर था जो बोकारो स्टील प्लांट और पॉवर प्लांट के आस पास विकसित हुआ था, लेकिन आज दोनों कम्पनियों की हालत ख़राब है, और बंद होने की स्थिति में है। सरकार भी इनको बंद करने का मन बना चुकी है, वही हाल दामोदर वैली कारपोरेशन का है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इसके निजीकरण की प्रक्रिया किसी समय भी शुरू की जा सकती है।
झारखंड के गठन के बाद से ही राज्य विऔद्योगीकरण (Deindustrialization) का शिकार हो रहा है। 1990 के दशक के अंत में सकल राज्य घरेलू उत्पाद में उद्योग का हिस्सा लगभग 60% था जो आज, 40% तक कम हो गया है।

कारखानों में लगे व्यक्तियों की संख्या 1999-2000 और 2017-18 के बीच निरपेक्ष रूप से कम हुई है। फैक्टरियां छोटी हो गई हैं, और जो भी पूंजी निवेश हुआ है, वो ज्यादातर खनिज निकासी के क्षेत्र में हुई है। इसका नतीजा है की राज्य की जनता के लिए कोई भी नई नौकरी नहीं मिली है, ना ही राज्य का कोई खास विकास हुआ है, जैसा की किसी औद्योगिक राज्य में देखा जा सकता है।

झारखण्ड, आज भारत का कांगो बन चुका है, यहाँ पूंजीपति केवल उसकी खनिज सम्पदा के दोहन के लिए निवेश करने आते है।

राज्य की आम जनता के लिए विकास विनाश का रूप ले चुका है। राज्य में भूख से पिछले 3 सालों में 23 लोगों के मरने की खबर आई है, असल में यह संख्या कहीं अधिक होगी। कुपोषण के मामले में भी राज्य अव्वल है, पांच वर्ष से कम उम्र के आधे से अधिक बच्चे कुपोषित हैं और इनमें से 12 प्रतिशत गंभीर रूप से कुपोषित हैं। परिणामस्वरूप तीन वर्ष से कम उम्र के लगभग आधे बच्चे ठिगनेपन से ग्रसित हैं।

लेकिन, राज्य में धार्मिक भक्ति में कोई कमी नहीं है, गरीबी, विस्थापन से चाहे लोगों का खून नहीं खौलता, लेकिन हिन्दू मुस्लिम के नाम पर ज़रूर मरने काटने को भुत से भक्त तैयार दिक्ते हैं, रघुबर दास के राज में अब तक २२ लोग की धर्म के नाम पर हत्या (मौब लींचिंग) की जा चुकी है, लेकिन सरकार ने कोई संज्ञान लिया हो ऐसी खबर नहीं आयी।

हैरानी की बात है कि ऐसे राज्य में कोई भी दल के पास वैकल्पिक मुद्दा नहीं है, सभी वही घिसे पिटे मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे हैं, और जीतेंगे भी।

वाम पार्टियों की सीट. जहाँ वे मजबूत दिखाई दे रही हैं वो घट कर केवल दो रह गयी हैं, धनबाद में निरसा और गिरिडीह की बगोदर। लेकिन इन दोनों सीट पर चुनाव लड़ रहे वाम प्रत्याशी अपने पिता की हत्या के बाद चुनावी मैदान में आये और विधान सभा पहुचें भी, लेकिन दोनों की राजनीतिक लाइन को देखते हुए उनमें और अन्य गैर भाजपा दलों में भेद करना दुरूह काम होगा। लाल झंडा, और कामरेड शब्द को छोड़ दें तो इनके द्वारा उठाये गये मुद्दे और इनका काम कोई भी इनके वाम आन्दोलन को नई दिशा देने वाला नहीं लगता।

दूसरी वाम पार्टियों के बारे में जितना कम कहा जाये उतना बेहतर, एक राज्य जहाँ शासक वर्ग की नीतियों के चलते लाखों लोग विनाश के कगार पर पँहुच चुके हैं, वहन अगर वामपंथ मृतप्राय हो फुटबाल और बस स्टैंड बनाने की राजनीति करने लगे तो ऐसे वामपंथ का ख़तम होना ही ठीक है।

इस खत्म हुए वामपंथ से ही क्रन्तिकारी विचार से लैस पार्टी का उद्गम होगा। और इसी दिशा की तरफ आज मार्क्सवादी लेनिनवादियों को अपनी ताकतों लगनी होगी।

संयुक्त मोर्चा : ज्यॉर्जी दिमित्रोव

यह पुस्तक ज्यॉर्जी दिमित्रोव द्वारा संयुक्त मोर्चा की कार्यनीति पर उनके तीन लेखों का संग्रह है, इन तीन लेखों मे कामरेड दिमित्रोव ने कार्यनीति पर महत्वपूर्ण विचार रखे जिनकी प्रासंगिकता आज के दौर में और भी ज्यादा हो गयी है

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Over Production Under Consumption and the Government’s Prescription

After grabbing the bigger chunk from RBI, government has now directed the PSUs to loosen their pockets, and shelve out money for Capital Expenditure (Capex). What, does this mean? It is a jargon that amounts to ordering the few profit making PSUs to give money to corporates. When this amount would be invested into capex, it would translate to the corporates getting more work and ultimately getting sop indirectly from the government. Continue reading

Marxist Leninist Understanding on the Right of Self Determination and National Question

For us, Marxist Leninists, the brilliant theses of Stalin on nationality question remains the bedrock on understanding the nationality issue a barometer to formulate our policy and tactics. Along with Stalin’s theses, there are the extant text of writings by Marx, Engels, Lenin and of the Marxists of this country where the issue has been discussed and deliberated in detail. We have dedicated a section on the understanding of nationality question with respect to Kashmir, where some of the theses have been quoted, from that period after the transfer of power, before the entire movement degenrated into the abyss of revisionism and dogmatic-Marxism of the CPI(ML) era.   Apart from Stalin’s article Marxism and National Question, the Marxist-Leninist understanding on the subject is elaborated in two of Lenin’s articles dealing with the subject–  “Critical Remarks on the National Question” and “The Right of Nations to Self-Determination” Continue reading