फासीवादी विचारधारा और मार्क्सवाद

फासीवाद या पूरी पूंजीवादी व्यवस्था से अगर कोई विचारधारा लोहा ले सकता है तो वह है मार्क्सवाद। हाँ यह ज़रूर है कि पिछले सदी में इसपर हुए हमले और कुत्साप्रचार से यह घायल हुई है।

फ़्रांसिसी विचारक और दार्शनिक एलेन बदीओ (Alain Badiou ने इसे खूबसूरती के साथ रखा है)

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2022 का बजट —  आटा के बदले डाटा

प्रत्यूष नीलोत्पल

वैसे तो बजट चालू वर्ष की वित्तीय गतिविधियों का लेखा जोखा और आगामी वर्ष के आय व्यय तथा आर्थिक योजना के अनुमानित आंकड़ों का ब्यौरा होता है, किन्तु इस साल का बजट भिन्न था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पहली फरवरी को लोकसभा में आम बजट 2022-23 पेश करते हुए अपने भाषण में इसे अगले 25 साल का खाका (ब्लू प्रिंट) घोषित कर दिया। सो इस वर्ष का बजट सालाना न होकर अगले 25 साल के मार्गदर्शक दस्तावेज में तब्दील हो गया। और भारत औपचारिक तौर से अमृतकाल में प्रविष्ट हो गया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह बजट 100 साल की भयंकर आपदा के बीच विकास का नया विश्वास लेकर आया है। ये बजट अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ ही सामान्य नागरिक के लिए अनेक नए अवसर बनाएगा। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर से वर्ष 2022-23 के आम बजट पर आयोजित कार्यक्रम ‘‘आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था’’ को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि बहुत जरूरी है कि भारत आत्मनिर्भर बने और उस आत्मनिर्भर भारत की नींव पर एक आधुनिक भारत का निर्माण हो।

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बिहार में बेरोजगारों का चक्काजाम

किसान आन्दोलन का चक्का जाम अब बेरोजगारों ने अपने जिम्मे कर लिया है। सड़कों के साथ अब रेल लाइनें जाम की जा रही हैं। घर और नौकरी के बीच कोचिंगों को बनाते, कोचिंगों में फंसे बेरोज़गार भिखना पहाड़ी में कश्मीरी ढंग की पत्थरबाजी और बैरीकेडिंग को याद कर रहे हैं। Continue reading “बिहार में बेरोजगारों का चक्काजाम”

राजनीतिक विकल्प: चुनावी या आंदोलनकारी


एक बार फिर भारत में चुनावी गर्मी बढ़ने लगी है, और राजनीतिक विकल्प और गठजोड़ की बात शुरू हो गई है। पिछले एक साल से चल रहे किसान आंदोलन के संदर्भ ने इस बातचीत को नए आयाम दिए हैं। परंतु क्या विकल्प का प्रश्न महज चुनावी और राजकीय है? क्या जन आंदोलन और जन आक्रोश चुनावी राजनीति और राजकीयता के पक्ष-विपक्ष में चारे की तरह हैं? क्या इस चुनावी पक्ष-विपक्ष का चक्र और सरकार में परिवर्तन राजसत्ता के मौलिक चरित्र पर असर डालता है? क्या यही चक्र राजसत्ता के पुनरुत्पादन का जरिया नहीं है? ऐसा तो नहीं कि हम विकल्प के सवाल को राजसत्ता के गलियारे में सीमित कर आंदोलनों के अंदर विद्यमान व्यवस्था परिवर्तन की संभावनाओं को नजरअंदाज कर रहे हैं?

चर्चाकर्ता: —– प्रत्यूष चंद्र, सुनील कुमार और प्रत्यूष नीलोत्पाल

पेगासस और निगरानी का राजनीतिक अर्थशास्त्र

पेगासस स्पाइवेयर (जासूसी सॉफ्टवेयर) का सरकारों द्वारा इस्तेमाल विश्व भर के नागरिक समूहों के लिए एक अहम मुद्दा बन गया है। भारत में भी कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों (ख़ास तौर से जिनकी पत्रकारिता मोदी शासन के लिए असुविधाएं पैदा करती हैं), नेताओं और कुछ उद्योगपतियों के मोबाइलों पर भी पेगासस पाया गया। कई लोग इस लिस्ट में भाजपा के कुछ नेता और मोदी के करीब माने जाने वाले अनिल अम्बानी जैसे पूंजीपतियों के नाम शामिल होने पर आश्चर्य भी जता रहे हैं। हालाँकि अभी तक भारत सरकार इस निगरानी में उसके हाथ होने के सवाल से बचती नज़र आ रही है, लेकिन तथ्य बहुत हद तक इसकी पुष्टि करते हैं। कोर्ट में तो सरकार ने कह ही दिया है कि वह इस सवाल पर ज्यादा नहीं कहना चाहती क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मसला है।

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पूंजी की शक्ति

विकास के लिए संसाधन जुटाने के लक्ष्य से नवीन बजट में जब 40 प्रतिशत सरचार्ज लगाया गया तो विदेशी संस्थागत निवेशक भी इस बढ़े हुऐ सरचार्ज के दायरे में आ गये। इससे उन्होंने भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालना शुरू कर दिया था।

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यह क्रांति की बेला है

यह क्रांति की बेला है
हर तरफ मेला है
देखो
यहां क्रांति वहाँ क्रांति
आज क्रांति हो रही बोर्डर पर
कल जो थी बाग में

ज़मीन में क्रांति
आसमान में भी क्रांति
क्रांति का तबेला
अगर है कहीं तबेला
तो वो है सिर्फ मेरा

Capital, Labour and the Farm Laws: Who stands to gain?

 

The Sarkari Doublespeak?

The Union Minister Nitin Gadkari while talking to the journalists of The Indian Express (January 4, 2021) said:

“….after the Green Revolution, we now have surplus rice. Prior to 2020’s production, we had about 280 lakh tonnes of rice in our godowns. We can give rice to the entire world. In case of corn, the MSP is Rs 1,700, when the market price is about Rs 1,100. Last year, we exported 60 lakh tonnes of sugar, providing a subsidy of Rs 600 crore. Why is it that the cost of sugar in the international market is Rs 22 per kg but we are paying Rs 34 per kg for sugarcane? Our MSP is more than the international and market prices, and that is the problem.
I have been talking about ethanol for the last 12 years. But the permission to convert foodgrains (to fuel) was not granted. We import fuel worth Rs 8 lakh crore. We can make 480 litres of ethanol from 1 tonne of rice. From 1 tonne of corn, we can make 380 litres of ethanol. The economy of Bihar and Uttar Pradesh will be transformed.”
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Condemn the arrest and custodial sexual violence faced by Nodeep Kaur!

Campaign Against State Repression demands the immediate release of Nodeep Kaur and strict action against the Haryana Police for targeting workers in the Kundli Industrial Area!

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कृषि कानून, खेती का प्रश्न और वर्गीय दृष्टिकोण

विरोध में वर्चस्वकारी स्वर

हाल में कृषि क्षेत्र से संबंधित मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन कानूनों पर तथाकथित हरित क्रांति के इलाकों के किसानों ने पिछले हफ्ते भर से दिल्ली के बार्डरों को जाम कर रखा है। ये आंदोलन इन इलाकों में सबसे प्रखर रहे हैं क्योंकि यहीं पर किसानों को सरकारी सहयोग से अधिक फायदा हुआ है। ये आंदोलन इन किसानों की व्याकुलता को दिखाता है। ये किसान कृषि के अंदर खुले बाजारीकरण की अनिश्चितताओं से घबराए हुए हैं। इस आंदोलन का नेतृत्व अवश्य ही बड़े किसानों और उच्च मध्यम किसानों के हाथ मे है जिन्हें इस सहयोग से सबसे अधिक फायदा मिलता था। Continue reading “कृषि कानून, खेती का प्रश्न और वर्गीय दृष्टिकोण”

मार्क्सवाद क्या है? एमिल बर्न्स

एमिल बर्न्स द्वारा रचित चर्चित पुस्तिका What Is Marxism? का हिंदी अनुवाद, हम अपलोड कर रहे हैं।

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दिल्ली में बस्तियों को गिराने का आदेश: गरीबों को उजाड़ने का षड्यंत्र

देश कोरोना और आर्थिक संकट से गुज़र रहा है जिनका सबसे ज्यादा असर ग़रीबों पर हुआ है, और इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय बेंच ने दिल्ली में रेलवे लाइनों के आस पास बसी करीब 48000 झुग्गियों को तोड़ने का आदेश दे दिया है।

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Fundamentals of Leninism, लेनिनवाद के मूल सिद्धांत

स्तालिन द्वारा लिखित लेनिनवाद के मूल सिद्धांत लेनिनवाद को समझने और उसकी प्रासंगिकता को जानने के लिए एक बेहद जरूरी पुस्तक है।

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Marxism, Legal System and the Pain of Leftists


*Pratyush Nilotpal

The Left movement, if we may still call it a movement, is in constant pain. It’s heart aches on the arrest of the eminent activists of Bheema Koregaon case, it twinges for the arrest of eminent professors, its angst is further exacerbated when other eminent intellectuals mostly high profile activists, academicians, lawyers are arrested or slapped with charges like contempt of court. One can easily say that the Leftists are in constant pain, or shall we say they have become a painful lot?

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What Is To Be Done, by Lenin in Hindi


लेनिन की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक, क्या करें , संशोधनवादियों से लड़ने के लिए आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस वक़्त थी जब इसे लिखा गया था।

https://drive.google.com/file/d/159XB282v_z9H16FFiARz-0khAfJg1Tto/view?usp=drivesdk

भारत चीन विवाद- फायदा किसका?

जब विश्व कोविड 19 से जूझ रहा है, तब मई महीने में लद्दाख के दो इलाके पैंगोंग-त्सो का गलवान घाटी और फिंगर 4 में भारत और चीन की सेनाओं के हज़ार से भी ज्यादा सैनिक आमने सामने आ चुके हैं। 2017 में हुए डोकलाम के बाद यह इन दोनों देशों की सेनाओं के आमने सामने आने की दूसरी घटना है।

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जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध!


एक तरफ लोग मर रहे थे, वहीं सरकार इस त्रासदी को भी एक तमाशा, एक उत्सव के रूप में तब्दील कर रही थी।


1943-44 में बंगाल में भयानक अकाल पड़ा था जिसमें लगभग 30 लाख लोगों ने भूख से तड़पकर अपनी जान गंवाई थी, कई लोगों का मानना है की यह संख्या इससे कई गुना अधिक थी। इस महा त्रासदी के पीछे थी अंग्रेज़ी साम्राज्यवादी हुक़ूमत। बंगाल में लोग जब मर रहे थे तो अंग्रेज़ी सरकार वहां से अनाज निर्यात कर रही थी।

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कार्ल मार्क्स की एक कविता


दुनिया भर में इंसानों के सबसे चहेते साथी, इंसानियत, हक़ और बराबरी के सबसे भरोसेमंद अपराजेय योद्धा, महान दार्शनिक, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ व समाजवाद के प्रणेता एवं महान शिक्षक कार्ल मार्क्स का इस वर्ष 202 वां जन्मदिन था।  5 मई 1818 को उनका जन्म हुआ।

सामाजिक न्याय, बराबरी और इंसानी हक़ अमर रहें!!! समाजवाद ज़िंदाबाद!!!


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Stop the witch-hunt of activists! Condemn the arrests of Pinjra Tod members Devangana Kalita and Natasha Narwal!

Stop the witch-hunt of activists!
Condemn the arrests of Pinjra Tod members Devangana Kalita and Natasha Narwal!
Release all political prisoners!

May 25th 2020

On the evening of 23rd May 2020, the Delhi Police arrested Devangana Kalita and Natasha Narwal, activists of Pinjra Tod and students of Jawaharlal Nehru University. Charged under FIR 48/2020, both were initially interrogated by the police at their home.

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How Not to Understand Lenin, A Reply to Apoorvanand’s Article

*A Ranjan and D Rashmi**

“Nicolai Lenin, the great, the genuine man, is dead. His death struck pain into the hearts of those who knew him. But the dark line of death only showed up more sharply his importance in the eyes of the world – his importance as the leader of working people. And if the cloud of hate surrounding his name, the cloud of lies and calumnies, sere still more dense than it is, no matter, there are no forces that could extinguish the torch lifted by Lenin in the darkness of the maddened world. And there has been no man who better deserved to be eternally remembered. Nicolai Lenin is dead. But the heirs of his wisdom and will are still alive. In the end honesty and truth created by man conquer. Everything must yield to those qualities which make a Man. ”

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Why we oppose the slogan Jai Bheem Lal Salam!

Comrade Alok Mukherjee, has put up a post on facebook which deals with Ambedkar and his evaluation. Though comrade Mukherjee has in the beginning of his statement, clarified that facebook post is not a platform for evaluation of personalities. We agree with comrade Mukherjee’s stand, yet such posts and statements published on social media do provide pointers to one’s political viewpoint and stand. For person like comrade Mukherjee, who has been a known face of the Indian Communist movement, since his days as one of the central leaders of CPI(ML) PCC and CPI(ML) Janshakti. Now a Central leader of CPI(ML) Class Struggle, (Kanu Sanyal group) his words carry weight and also merits serious reading.

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दिल्ली और कश्मीर में कार्यकर्त्ताओं एवं पत्रकारों की दुर्भावनापूर्ण खोज बन्द की जाये तथा कठोर कानून यूएपीए को रद्द किया जाये।

पिछले दो सप्ताहों के दौरान नई दिल्ली में दिल्ली पुलिस द्वारा अनेकों कार्यकर्ताओं और छात्रों को लक्षित एवं परेशान किया गया है। खुले फर्द बयानों के तहत काम करती पुलिस उन व्यक्तियों, जिनमें से कई कोविड-19 जनित अनियोजित लॉक डाउन के चलते भोजन एवं अन्य जरूरी आपूर्त्ति से मरूहम लोगों एवं मजदूरों को अपरिहार्य रिलीफ प्रदान करने में लगे हुए हैं, को फरवरी 2020 के अन्त में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा को भड़काने और उसमें शामिल होने के आरोप में फंसाने की कोशिश कर रही है। Continue reading “दिल्ली और कश्मीर में कार्यकर्त्ताओं एवं पत्रकारों की दुर्भावनापूर्ण खोज बन्द की जाये तथा कठोर कानून यूएपीए को रद्द किया जाये।”

लेनिन

इस साल लेनिन की 150वीं वर्षगांठ हम मना रहें हैं। 22 अप्रैल सन 1870 को लेनिन का जन्म रूस के शहर उलयनवोसक में हुआ था। लेनिन ने विश्व इतिहास पर अपनी एक ऐसी छाप छोड़ी, जिसे उनके दुश्मन भी लाख कोशिशों के बावज़ूद नकार पाने में असमर्थ हैं।

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नागरिक अधिकार कार्यकर्त्ताओं को जेल में भेजने का सुप्रीम कोर्ट का विवादास्पद फैसला (प्रेस रिलीज)

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च, 2020 को नागरिक अधिकार कार्यकर्त्ता प्रो. आनन्द तेलतुम्बड़े और गौतम नवलखा के एण्टीसिपेटरी बेल पिटीशन को खारिज करते हुए 6 अप्रैल, 2020 को उन्हें पुलिस के समक्ष आत्मसर्पण करने का निर्देश दिया। इस फैसले के खिलाफ दायर किए गए रिव्यू पिटीशन की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 8 अप्रैल को की गई।

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मन की बात से पेट नहीं भरता

मोदी ने आज  फिर मन की बात  की, और अपने चिर परिचित नाटकीय ढंग से देशवासियों से 21 दिन के लौकडाउन के लिए माफी मांगी।

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Kashmir Question and Marxism Leninism: An Analysis for Debate

Kashmir Question and Marxism Leninism: (An analysis for debate)”

This booklet deals about the Kashmir question and analyses it from a Marxist Leninist perspective.

We would be soon printing this booklet.

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Political Indifferentism : Karl Marx

“The working class must not constitute itself a political party; it must not, under any pretext, engage in political action, for to combat the state is to recognize the state: and this is contrary to eternal principles. Workers must not go on strike; for to struggle to increase one’s wages or to prevent their decrease is like recognizing wages: and this is contrary to the eternal principles of the emancipation of the working class! Continue reading “Political Indifferentism : Karl Marx”

The Development of Fascism

*Gramsci

The events of Grosseto, Viterbo and Treviso are the initial phase of a new and definitive development of fascism. Punitive expeditions by small bands are giving way to actions by veritable army units, armed with machine-guns. In some areas fascist cavalry is making its appearance. In Siena, thousands upon thousands of fascists assembled, on the pretext of a provincial congress, to parade in military order with their own cavalry. Continue reading “The Development of Fascism”

AN URGENT APPEAL – RESIST POLICE ATROCITIES AGAINST BHALSWA WOMEN WORKERS FIGHTING AGAINST NRC-CAA

Around 400-500 women workers from Bhalswa JJ Colony, Badli (near Jahangirpuri) have been taking out daily mashal juloos

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ज़रूरी अपील – भलस्वा में एनआरसी-सीएए के खिलाफ संघर्षरत महिला मज़दूरों के विरुद्ध पुलिस दमन का विरोध करें*

भलस्वा जेजे कॉलोनी, बादली (जहाँगीरपुरी के पास) की लगभग 400-500 महिला मज़दूर पिछले दो दिनों से एनआरसी-सीएए के खिलाफ दैनिक मशाल जूलूस निकाल रही हैं (निम्न दो वीडियो देखें)।

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बजट 2020: अंधा बांटे रेवाड़ी

अंग्रेज़ी का एक शब्द है डेलूशनल(Delusional) जिसका अर्थ होता है भ्रम का शिकार होना, और जब कोई सरकार इसका शिकार होती है, तो वो 2020 में पेश बजट जैसा कुछ लाती है।

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Budget 2020: Sops to Corporates and Rhetoric for the People

The budget of 2020, like its predecessors was high on rhetoric but devoid of any substance. The governmental denial of the economic crisis was clearly discernible, with the Finance Minister, Nirmala Sitaraman looking out of sync with the reality. It was a delusional budget, without any vision or mission!

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China Myanmar Pact

Chinese President Xi Jinping (L), Myanmar President Win Myint (2nd L) and Myanmar State Counsellor Aung San Suu Kyi (2nd R), attending a ceremony marking Myanmar and China’s 70th anniversary of diplomatic relations in Naypyidaw. Photo: AFP/handout

The Chinese president Xi Jinping visited Myanmar on January 17-18 2020, it was the first visit by a Chinese president in 19 years.

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नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amemndment Bill): भारत को हिन्दू राष्ट्र और दो राष्ट्र सिद्धांत को वैध बनाने की दिशा में एक और कदम

नागरिकता संशोधन विधेयक को कैबिनेट ने मंज़ूरी दे दी और संसद में यह पास भी हो जायेगा।

इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद भारत की नागरिकता का मुख्य आधार व्यक्ति का धर्म होगा ना की उसकी कोई और बात। यह बिल भाजपा – आरएसएस की लाइन के मुताबिक बनाया गया है, जिन्हें भारत को एक हिन्दू राष्ट्र के तौर पर पेश करना है। Continue reading “नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amemndment Bill): भारत को हिन्दू राष्ट्र और दो राष्ट्र सिद्धांत को वैध बनाने की दिशा में एक और कदम”

झारखण्ड चुनाव और जनता

–दामोदर


राज्य की आम जनता के लिए विकास विनाश का रूप ले चुका है। राज्य में भूख से पिछले 3 सालों में 23 लोगों के मरने की खबर आई है, असल में यह संख्या कहीं अधिक होगी। कुपोषण के मामले में भी राज्य अव्वल है, पांच वर्ष से कम उम्र के आधे से अधिक बच्चे कुपोषित हैं और इनमें से 12 प्रतिशत गंभीर रूप से कुपोषित हैं। परिणामस्वरूप तीन वर्ष से कम उम्र के लगभग आधे बच्चे ठिगनेपन से ग्रसित हैं।

झारखण्ड में सिर्फ 81 सीटें हैं लेकिन राज्य मे चुनाव की अवधि करीब करीब 1 महीने की है। चुनाव नीरस और उक्ता देनेवाला साबित हो रहा है।

राज्य में वैसे पार्टियों की कमी नहीं है, और करीब करीब सभी दलों ने अपने उम्मेदवार मैदान में उतारे हैं।

कांग्रेस महाराष्ट्र को दोहराने की उम्मीद में है, तो वहीं भाजपा अपनी पूरी ताकत इस राज्य में झोंक चुकी है। Continue reading “झारखण्ड चुनाव और जनता”

संयुक्त मोर्चा : ज्यॉर्जी दिमित्रोव

यह पुस्तक ज्यॉर्जी दिमित्रोव द्वारा संयुक्त मोर्चा की कार्यनीति पर उनके तीन लेखों का संग्रह है, इन तीन लेखों मे कामरेड दिमित्रोव ने कार्यनीति पर महत्वपूर्ण विचार रखे जिनकी प्रासंगिकता आज के दौर में और भी ज्यादा हो गयी है

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The PMC Bank fiasco and the impending economic catastrophe

The Punjab and Maharashtra Cooperative Bank (PMC) fiasco is an indicator of the impending economic catastrophe. PMC is on verge of bankruptcy due to it lending 2,500 crore to real estate company HDIL, which went bancrupt pulling the bank down with it.

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Over Production Under Consumption and the Government’s Prescription

After grabbing the bigger chunk from RBI, government has now directed the PSUs to loosen their pockets, and shelve out money for Capital Expenditure (Capex). What, does this mean? It is a jargon that amounts to ordering the few profit making PSUs to give money to corporates. When this amount would be invested into capex, it would translate to the corporates getting more work and ultimately getting sop indirectly from the government. Continue reading “Over Production Under Consumption and the Government’s Prescription”

Marxist Leninist Understanding on the Right of Self Determination and National Question

For us, Marxist Leninists, the brilliant theses of Stalin on nationality question remains the bedrock on understanding the nationality issue a barometer to formulate our policy and tactics. Along with Stalin’s theses, there are the extant text of writings by Marx, Engels, Lenin and of the Marxists of this country where the issue has been discussed and deliberated in detail. We have dedicated a section on the understanding of nationality question with respect to Kashmir, where some of the theses have been quoted, from that period after the transfer of power, before the entire movement degenrated into the abyss of revisionism and dogmatic-Marxism of the CPI(ML) era.   Apart from Stalin’s article Marxism and National Question, the Marxist-Leninist understanding on the subject is elaborated in two of Lenin’s articles dealing with the subject–  “Critical Remarks on the National Question” and “The Right of Nations to Self-Determination” Continue reading “Marxist Leninist Understanding on the Right of Self Determination and National Question”

कृषि संकट और पूँजीवाद

भारतीय कृषि का संकट अपने चरम पर है और इसके खत्म होने का कोई आसार नजर नहीं आ रहा। यह संकट कोई एक दो साल का नहीं है बल्कि इसके तार 1990 के बाद से सरकार द्वारा अपनाई नीतियों से जुड़ी हुई है। सरकारी संस्थानों और उन पर आश्रित राजनीतिक आर्थिक पंडितों ने इस संकट पर कई बातें कही लेकिन मूल प्रश्न पर सभी खामोश रहे। किसान संगठनों का हाल भी यही रहा है, संकट को केवल उत्पाद का सही कीमत ना मिलने औ koर खेती के लागत का दिनों दिन महँगा होने इसी के आस पास अपनी बातों को रखा है। लेकिन क्या कृषि संकट सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price MSP) और खेती में लगने वाले समान जैसे बीज, कीटनाशक इत्यादि के बढ़ती कीमतों की वजह से है? अगर सिर्फ यही दो संकट का कारण रहते तो फिर इसका समाधान भी आसानी से हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं है। Continue reading “कृषि संकट और पूँजीवाद”

A Great Marxist-Leninist Revolutionary and Thinker – Foto Çami

This article appeared in Albania Today, 6 (85) 1985. It was presented in the  Scientific Conference dedicated to the Immortal Work of Comrade Enver Hoxha Continue reading “A Great Marxist-Leninist Revolutionary and Thinker – Foto Çami”

संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष मार्क्सवादी लेनिनवादी का प्रमुख कार्य है

लेनिन अपने लेख ‘मार्क्सवाद और संशोधनवाद’ में लिखते हैं कि अगर जॉमेट्री के नियम का असर मानव हितों पर होता तो उनके खंडन का प्रयास भी निश्चित तौर पर होता। लेनिन की यह बात संशोधनवाद से संघर्ष में एक सूक्ति से कम नहीं है।

लेनिन तब बर्सटीनपंथियों और काउत्स्की के संशोधनवाद से टक्कर ले रहे थे, और आज हम इनके चेलों के अलावा भांति भांति के संशोधनवादियों की पैदा हुई तरह तरह के जमात देखने को मजबूर हैं। चाहे वो यूरो-कम्युनिस्ट धारा के घोषित अघोषित समर्थक हों, ख्रुसचेवपंथी हों या अन्य तरह के ‘मार्क्सवादी’ सभी बराबर पूंजीवाद की चाकरी में लगे हुए हैं। Continue reading “संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष मार्क्सवादी लेनिनवादी का प्रमुख कार्य है”

Editorial of Acero Revolucionario (Revolutionary Steel) Organ of Marxist–Leninist Communist Party of Venezuela On the present crisis in Venezuela

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In addition to the capitalist crisis, imperialist aggression, errors of social democracy and weaknesses of the revolutionary movement, a more complex process with deeper consequences is underway in Venezuela: the decomposition of the Bourgeois State. Continue reading “Editorial of Acero Revolucionario (Revolutionary Steel) Organ of Marxist–Leninist Communist Party of Venezuela On the present crisis in Venezuela”

Democratic Republic of Congo: Upcoming elections bring more imperialist interference

This article was first published in Avante, the weekly newspaper of the Portuguese Communist Party, on Nov. 29. Its author was formerly a member of the Secretariat of the PAIGC, the party leading the struggle for the liberation of Guinea-Bissau and Cape Verde.
Translation by WW Managing Editor John Catalinotto.

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Man and Plan in Soviet Economy by ANDREW ROTHSTEIN

This book was written when the deeper truths about the Soviet Union, to which the eyes of many millions were opened for a short while during the war against Nazi Germany, were being temporarily obscured again by the passion of controversy about the settlement of Europe after the war.

Experience throughout the thirty years’ existence of the Soviet Union, however, suggests that study of the permanent features of the Soviet economy and polity, as they are, is a better guide to Soviet policy, and therefore to European peace and prosperity, than passion or prejudice. Continue reading “Man and Plan in Soviet Economy by ANDREW ROTHSTEIN”

Is Crony Capitalism Different from Capitalism?

                                                                                                                                                                                         By Damodar

Of late there has been a distinct unease among the bourgeoisie academicians’ world over on the rise of what they call as “crony” capitalism. Somehow there is an illusion among them of capitalism that has been derailed of its moral, ethics and the great ideal of freedom & free trade, usurped by what has increasingly been called as crony capitalism. Bourgeoisie academician from right to Left have been lamenting about the loss that capitalism has suffered and the crisis the capitalism is suffering and as a solution they say if the “real” capitalism is restored all the ills facing the planet would magically be solved. It is just a matter of bringing back real capitalism and get rid of cronyism or corporatism. Continue reading “Is Crony Capitalism Different from Capitalism?”

Khrushchev and Soviet History

By Moni Guha

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Αnti-revisionist caricature of 1976 by Albanian cartoonist Zef Bumçi depicting Nikita Khrushchev as a servant of the bourgeoisie

Reviewing Victor Hugo’s biography of Napoleon, Karl Marx wrote in the preface to his book, ‘The Eighteenth Brumaire’- ‘The event itself appears in his work like a bolt from the blue. He sees in it only the violent act of a single individual. He does not notice that he makes this individual great instead of little by ascribing to him a personal power of initiative such as would be without parallel in world history.’ Continue reading “Khrushchev and Soviet History”

WE RAISE THE RED FLAG COMMEMORATING THE GREAT OCTOBER SOCIALIST REVOLUTION

Today marks the 101st anniversary of the Great October Socialist Revolution, an epoch of unprecedented importance for the history of human kind. It was an event that divided the known human history into two, one before the revolution and one after it. Why do we even after a century of its occurring still take cognizance of this phenomenon? In the history of world revolutions October holds a unique place, and to understand the importance we shall have to once more look at the revolutions that took place before it. Continue reading “WE RAISE THE RED FLAG COMMEMORATING THE GREAT OCTOBER SOCIALIST REVOLUTION”

DRAFT POLITICAL RESOLUTION TO 11th CONGRESS OF THE CPI(ML) RED STAR: Some Observation

CPI(ML) Red Star (hereafter RS) led by comrade K.N.Ramachandran has published its bannerdraft political resolution for their forthcoming party congress. The said draft resolution has been published in the party’s central organ Red Star in the August 2018 is

sue. We have read the draft political resolution (hereafter pol res) with great interest. Yet we cannot say that the pol res or RS has grasped the current political situation in full, neither can say that it seems ready to counter the current situation that has taken shape particularly after 2014.

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What is Economics :: Rosa Luxembourg

Economics is a peculiar science. Problems and controversies arise as soon as we take the first step in this field of knowledge, as soon as the fundamental question – what is the subject matter of this science – is posed. The ordinary working man, who has only a very vague idea of what economics deals with, will attribute his haziness on this particular point to a shortcoming in his general education. Yet, in a certain sense, he shares his perplexity with many learned scholars and professors who write multivolumed works dealing with the subject of economics and who teach courses in economics to college students. It appears incredible, and yet it is true, that most professors of economics have a very nebulous idea of the actual subject matter of their erudition. Continue reading “What is Economics :: Rosa Luxembourg”

Urgent Declaration for Nicaragua

Jul 19, 2018

By this, as intellectuals, social activists and academics, we want to express our deep rejection of the very serious situation of state political violence and violation of Human Rights that Nicaragua is going through, [and assert the] responsibility of the current regime of Ortega-Murillo, which has resulted in about three hundred dead in the last three months.

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Petition from V D Savarkar (Convict No. 32778) to the Home Member of the Government of India, dated November 14, 1913

Below is the text of mercy petition written by V.D Savarkar to the British India Government from Cellular jail in Andaman. The authenticity of this petition has been challenged by the Hindutva supporters and ideologues. This document was reproduced by yhe eminent right wing historian, RC Majumdar, who is considered to be a sympathetic to the Hindutva ideology and known for communal slant.


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Fascist Onslaught in India

Sakhav

hindu fasc

The ascendancy of the BJP to power marked the beginning of fascist onslaught in India. Enforcing a militant nationalism, atrocious violations of labour laws, brutal repression of dissidents, creating mass hysteria by using various means of media, armed squads to terrorise minorities and dalits, these are the characteristics of the fascist terror that India has to face today. What is attempted in the following article is to expose the fascistic character of the ruling party, the BJP and its parent organisation, the RSS. Continue reading “Fascist Onslaught in India”

Growth or Jobless Growth: What Does the Statistics Say?

Damodar

If any sector has been affected most in four years of Modi government definitely it is the economy. Courtesy Modi and his finance minister Arun Jaitley, today there has been a perceptible decline in every sector of the economy. From Manufacturing to service and from joblessness to jobless growth. The impending economic catastrophe is now round the corner, but like Nero the rulers are engrossed in rewriting history and patting themselves for their own work.

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Why Was Stalin Denigrated and Made a Controversial Figure?

Book Release

why stalin MG

Stalin Society of India has published a booklet titled: “Why Was Stalin Denigrated and Made a Controversial Figure?” Written by the late Communist theoretician comrade Moni Guha (MG).

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Book Published , Why was Stalin Denigrated.., by Moni Guha

why stalin MGStalin Society of India has published this booklet written by veteran Communist intellectual late comrade Moni Guha.
In this small but very important work, comrade Guha has analysed in detail the events that unfolded immediately after the death of Stalin. In fact MG raised question on the death and circumstances leading to the death. It has been well established now that Stalin, was very much aware of the deviations that had cropped in the party and Soviet government. Continue reading “Book Published , Why was Stalin Denigrated.., by Moni Guha”

Capital’s Share of Income is Way Higher than You Think

Almost half of households’ market income is received for just being wealthy: owning stuff.

by Steve Roth
https://evonomics.com (May 18 2018)

The shares of income going to “capital” and “labor” are vexed issues. How much is received for doing work, and how much is unearned “property income” – interest, dividends, et cetera? For a long time, economists thought these relative shares stayed roughly unchanged over time {1}. But since the 1970s, and especially since 2000, the share going to owners of capital has been increasing, while labor’s share has gone down.

People get income for doing stuff, and they get income for owning stuff. Increasingly the latter. And the ownership share of income goes to a small slice of households that own almost all the stuff {2}. Continue reading “Capital’s Share of Income is Way Higher than You Think”

Modi Meets Xi: If Wishes Were Horses

* Damodar

Indian Prime Minister went on to yet another foreign tour, this time to China. Strangely, called ‘informal meeting’. The government sources and the even more ‘official’ media both termed this as a historic, bold and unprecedented. Something that they have been doing assiduously to all such trips undertaken by the Prime Minister, that both literally and figuratively have been in all the four corners of the world. Continue reading “Modi Meets Xi: If Wishes Were Horses”

The Fascist Coup in Indonesia and the Lessons Communists Draw from It

(Reproduced from the «Zeri i Popullit» daily dated May 11, 1966),  The «Naim Frasheri» Publishing House, Tirana, 1966)

Contents

1. How should «democratic freedoms» in a bourgeois state be assessed and utilized?

2. Communists and alliances with progressive forces

3. Strengthen the international unity of Marxist-Leninists

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Tripura elections 2018: Fall of the last revisionist Bastille

manik
Train to nowhere

*Damodar

The electoral rout of CPI (M) in its last stronghold of Tripura seemed to be the culmination of the long rot which was faced by this revisionist party. Continue reading “Tripura elections 2018: Fall of the last revisionist Bastille”

The Theory of Permanent Revolution: A Critique

by LOIZOS MICHAIL

Trotskyism Study Group CPGB

INTRODUCTION

The theory of “Permanent Revolution”, as elaborated by Leon Trotsky, constitutes a central doctrine of the various groups which internationally form the “trotskyist” tendency within the Marxist movement. For the Trotskyist groups, the theory of Permanent Revolution is not just an analysis of the dynamics of the Russian revolution, but, more importantly, a major “tool” by which they interpret contemporary social reality, and upon which they construct their strategies for revolutionary transformation. Continue reading “The Theory of Permanent Revolution: A Critique”

New issue of Marxist – Leninist journal SCIENTIFIC SOCIALISM No. 2

cover

The new issue of Marxist – Leninist journal SCIENTIFIC SOCIALISM is out.

The contents are:

1. On killing of Gauri Lankesh

2. Socialism in one country: Revisiting the old debate

3 The crisis of Indian Economy 

4. Is North Korea Really A Threat To United States?

5. Russian Revolution and Debt

Contribution per copy Rs 20 (print copy)

For receiving it via email in PDF format please send your email id to

editor.scientificsocialism[at]gmail.com

 

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Is North Korea Really A Threat To United States?

Suraj Kumar

nk

War of Words

The war of words between the United States and North Korea has further intensified crisis on the Korean Peninsula.

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Socialism in One Country: Revisiting the old debate

There are some discussions that refuse to die, one of the prime reason for this is the obduracy of some who refuses to acknowledge history. This may be either due to their ignorance or due to a deliberate move on their part to sow more confusion, amongst the rank and file of the communist movement.

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New issue of journal Scientific Socialism (Organ of PRC-CPI ML)

 

Dear Friends and Comrades,

Scientific Socialism (Organ of PRC-CPI ML) is out.

The contents of the journal are:
1. Revolution Cannot Succeed by Killing Soldiers: A Critique of CPI (Maoist)’s killing of CRPF in Sukma
2. OBOR Summit: Imperialism With Chinese Characteristics
3. Kashmir Question and Marxism-Leninism: An Analysis for Debate
4. Long Live the Great Victory Over Fascism!
5. OROP: The Struggle Continues. . .
6. Successful Unity Conference of Five Youth Organisations held in Patna: A Report

You may download the PDF file from here

If you are interested in getting the print copy, please send us an email at editor.scientificscoialism@gmail.com

Fraternally,
Damodar,
Member Editorial Board (Scientific Socialism),
editor.scientificscoialism@gmail.com

कार्ल मार्क्स की जीवनी – राहुल सांकृत्यायन

Karl Marx

राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित कार्ल मार्क्स की जीवनी, एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण पुस्तक है, जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिये जो मार्क्स के जीवन और उनके विचारों को जानना चाहते हैं। Continue reading “कार्ल मार्क्स की जीवनी – राहुल सांकृत्यायन”

Georgi Dimitrov to Stalin on the Question of “Social-Fascism”

Dimitrov to Stalin, 1 July 1934. Original in Russian. Type-written, with handwritten comments by Stalin.

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“No Lessons from the Assembly elections”: A Note on CPI(ML)Liberation’s Lessons of the Assembly elections

CPI (ML) Liberation, on 14th March, came up with a note titled “Lessons of the Assembly elections”. The note, which is supposed to be a post-poll analysis of the recently concluded assembly elections should have been ideally titled “No Lessons from the Assembly elections”. Continue reading ““No Lessons from the Assembly elections”: A Note on CPI(ML)Liberation’s Lessons of the Assembly elections”

एन डी टी वी पर एक दिवसीय पाबन्दी:: देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर जकड़ते शिकंजे का एक और कदम

मोदी नीत सरकार जब से गद्दीनशीन हुई है तभी से देश के हालात बदलते नज़र आ रहे हैं. मीडिया और खास कर के इलेक्ट्रॉनिक (टी.वी) मीडिया पर जिस तरह से सरकार ने पकड़ बनाई है वह इस देश में पहले इस स्तर पर देखने को नहीं मिला था. कमोबेश सभी तथाकथित मुख्यधारा के चैनल हो या प्रिंट मीडिया आज एक खास तरह की लाइन का पालन करते नज़र आते हैं. पत्रकारिता के कुछ मापदंड या कहे आचारसंहिता होती हैं जिसमे अव्वल है तटस्थता, समाचार की सत्यवादिता, निष्पक्षता और पाठकों के प्रति सार्वजनिक जवाबदेही, किन्तु हमारे देश की पत्रकारिता इन सब मापदंडो के विपरीत एक ख़ास राजनीतिक लाइन और व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है.

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LONG LIVE THE STRUGGLE OF HONDA WORKERS

Comrades, Honda worker’s struggle has entered the 16th day. What is the situation of the struggle, the future strategy, what is the state of the struggling workers, what does the other workers think about this resistance and how much support it is garnering? What are the analysis of the situation? who are the ones taking decision, what measures are being taken to spread this movement to different parts of the country so that it receives support from entire nook and corner of the country. These are some of the questions being asked today, unfortunately there has been no initiative from the leadership to clarify these queries about the situation, leading to several other doubts being raised. Continue reading “LONG LIVE THE STRUGGLE OF HONDA WORKERS”

In the times of fascism: The onslaught of capital and the challenges before working class

Paper distributed by Indian Federation of Trade Unions (Sarwahara) at the All-India Workers Convention organised by Mazdoor Adhikar Sangharsh Abhiyan, to together build up national campaigns on Contract labour, Minimum Wages and Changes in Labour Laws, held in Ambedkar Bhawan, Delhi on 28th August 2016. Continue reading “In the times of fascism: The onslaught of capital and the challenges before working class”

Modi and Balochistan

So it was not very surprising to hear Modi talking about Baluchistan and Azad Kashmir in his Independent speech. While Modi in a way deviated from the earlier Prime Ministers who only cautioned Pakistan but never detailed what was to be done. Modi by referring to Baluchistan took an entirely new turn. But what was the substance? As always he made himself centre of the debate, not policy not human rights violation. Has any statesman ever said:

Narendra Modi has a unique penchant to turn every act of governance into propaganda. He has still to come out of his election phase and metamorphose into serious governance, one that is not only based on phrases and self-delusion but one that actually delivers those promises. Continue reading “Modi and Balochistan”

2 सितम्बर 2016 को देशव्यापी आम हड़ताल सफल करें

2 सितम्बर 2016 को देशव्यापी आम हड़ताल सफल करें

 

 

 

Indian Federation of Trade Unions (Sarwahara) parcha on the 2nd September strike.

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2 sept strike parcha in Hindi

The Soviet Union Looks To Its Health

The Bolshevik Revolution not only overturned the political and economic system that was based on exploitation but also brought with it a revolutionary reorganisation of the entire society. One of the major component was the reorganisation and implementation of a socialist health care system, which took care of the citizen from their cradle to grave. Continue reading “The Soviet Union Looks To Its Health”

H.G. Wells on Joseph Stalin

“I confess that I approached Stalin with a certain amount of suspicion and prejudice. A picture had been built up in my mind of a very reserved and self-centred fanatic, a despot without vices, a jealous monopolizer of power. I had been inclined to take the part of Trotsky against him. I had formed a very high opinion perhaps an excessive opinion, of Trotsky’s military and administrative abilities, and it seemed to me that Russia, which is in such urgent need of directive capacity at every turn, could not afford to send them into exile. Trotsky’s Autobiography, and more particularly the second volume, had modified this judgment but I still expected to meet a ruthless, hard—possibly doctrinaire—and self-sufficient man at Moscow; a Georgian highlander whose spirit had never completely emerged from its native mountain glen.

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